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नारद जी ने पूछा -जगन्नाथ!आपकी कृपा से मैंने सब कुछ जान लिया।अब आप ब्रह्म के स्वरुप का वर्णन कीजिऐ। सर्वेश्वर!ब्रह्म साकार है या निराकार?क्या उसका कुछ विशेषण भी है या फिर वह विशेषण रहित है। ब्रह्म का नेत्र से दर्शन हो सकता है या नहीं।वह समस्त देहधारियों में लिप्त है या नहीं।उसका क्या लक्षण बताया गया है?वेद में उसका किस प्रकार निरुपण किया गया है?प्रकृति उस परमात्मा से पृथक्क है अथवा ब्रह्मस्वरुपिणी है।
श्रुति में प्रकृति का सारभूत लक्षण किस प्रकार सुना जाता है?परमात्मा और प्रकृति दोनों में से सृष्टि में किसकी प्रधानता है?दोनों में कौन बडा़ है? आप मन में विचारकर जो सिद्धांत हो,वह बताइऐ।
नारद जी बात सुनकर भगवान शंकर हँस पडे़ और उन्होंने परब्रह्म परमात्मा तत्व का निरुपण करना शुरु किया।
महादेव जी बोले- वत्स नारद!तुमने जो -2 पूछा है ,वह उत्तम गूढ़ ज्ञान का विषय है।वेदों और पुराणों में भी वह उत्तम ज्ञान बडा़ दुर्लभ है। मैंने ब्रह्मा ,विष्णु, शेष
धर्म और महाविराट -इन सबने और श्रुतियों ने भी सब बातों का निरुपण किया है।नारद जी !जो सविशेष तथा प्रत्यक्ष दृश्यतत्व है,उसका हम लोगों ने वेद में निरुपण किया है।
बहुत समय पहले की बात है ,वैकुण्ठधाम में मैंने,ब्रह्मा जी और धर्म ने हरि के सामने यह प्रश्न उपस्थित किया था।उस समय उन्होंने जो उत्तर दिया था ,वह सुनो-
सनातन परब्रह्म, परमात्म स्वरुप है। वह समस्त कर्मों के साक्षी रुप से समस्त प्राणियों के शरीरों में स्थित है ।प्रत्येक शरीर में पांच प्राणों के रुप में साक्षात भगवान विष्णु विराजमान हैं,मन के रुप में ब्रह्मा जी,सम्पूर्ण ज्ञान(बुद्धि) के रुप में स्वयं मैं,और शक्ति के रुप में साक्षात ईश्वरीय प्रकृति विराजमान है।हम सबके सब परमात्मा के आधीन हैं। शरीर में उसके स्थित होने पर स्थित रहते और शरीर छोड़कर जाने पर हम भी पीछे -2चले जाते हैं जैसे राजा के सेवक सदा ही राजा का अनुसरण करते हैं ,वैसे ही हम लोग भी परमात्मा के अनुगामी बने रहते हैं।जीव परमात्मा का प्रतिविम्व हैं।वही कर्मों के फल का उपभोग करता है।जैसे जल से भरे हुऐ घडो़ं में पृथक्-2 सूर्य और चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब होता है।तथा उन घडो़ के फूट जाने पर वह प्रतिबिम्ब वापस सूर्य तथा चंद्रमा में लीन हो जाता है,उसी प्रकार सृष्टिकाल में भी परमात्मा के प्रतिविम्वस्वरुप जीव की उपलब्धि होती है। तथा सृष्टिमयी उपाधि के नष्ट हो जाने पर वह प्रतिविम्ब रुप जीव पुनः उस सर्वव्यापी परमात्मा में लीन हो जाता है।
वत्स संसार का संहार हो जाने पर एकमात्र मूल परमात्मा ही शेष रह जाता है।हम तथा यह चराचर जगत उसी में लीन हो जाते हैं।वह ब्रह्म मण्डलाकार ज्योतिपुज्जस्वरुप है।
ग्रीष्म ऋतु के मध्याह्नकाल में प्रकट होने वाले कोटि-2 सूर्यों के समान उसका प्रकाश है।वह आकाश के समान विस्तृत ,सर्व व्यापक तथा अविनाशी है।योगीजनों को ही वह चन्द्रमण्डल के समान शीतल दिखाई देता है।योगीजन उसे सनातन परब्रह्म कहते हैं और दिन -रात उस मंगलमय सतस्वरुप परमात्मा का ध्यान करते हैं।
वह परमात्मा निरीह,निराकार तथा सबका ईश्वर है।उसका स्वरुप उसकी इच्छा के अनुसार है। वह स्वतंत्र तथा समस्त कारणों का भी कारण है। परमानन्दस्वरुप ता परम आनन्द के प्राति का हेतु है।वह सबसे उत्कृष्ट ,प्रधान पुरुष ,प्राकृत गुणो से रहित तथा प्रकृति से परे स्थित है।प्रलय के समय उसी में सर्बबीजस्वरुपिणी प्रकृति लीन होती है।ठीक उसी तरह जैसे अग्नि में उसकी दाहिका शक्ति ,सूर्य में उसकी प्रभा ,दुग्ध में धवलता और जल में शीतलता रहती है।
मुने! जैसे पृथ्वी में गन्ध ,आकाश में शब्द सदा ही विद्यमान है,उसी तरह निर्गुण ब्रह्म में निर्गुण प्रकृति सदा स्थित है।जब ब्रह्म सृष्टि के लिऐ उन्मुख होता है,तब अपने अंश से पुरुष कहलाता है। वत्स!वही गुणों-विषयों से सम्बन्ध रखने पर प्राकृत तथा विषयी कहा जाता है।
त्रिगुणा प्रकृति उस परमात्मा में उत्कृष्ट छायारुपिणी मानी गयी है।नारद जी! जैसे कुम्हार मिट्टी से घडा़ बनाने में हमेशा ही समर्थ होता है,उसी प्रकार वह ब्रह्म प्रकृति के द्वारा सृष्टि निर्माण करने में सदा ही समर्थ है।जैसे कुमार मिट्टी का निर्माण नही करता,मिट्टी उसके लिऐ सनातन और नित्य है तथा जैसे सुनार सुवर्ण की सृष्टि नहीं करता,स्वर्ण उसके लिऐ नित्य ही है। उसी प्रकार वह परब्रह्म परमात्मा नित्य है तथा उसकी प्रकृति भी नित्य मानी गयी है।इसी से कुछ लोग सृष्टि में दोनों की समान प्रधानता मानते हैं ।
कुम्हार और सुनार क्रमशः मिट्टी तथा स्वर्ण पैदा करके लाने में समर्थ नहीं है तथा मिट्टी ,स्वर्ण भी कुम्हार व सुनार लाने की सामर्थ नहीं रखते।अतः मिट्टी और कुम्हार की घट में तथा सुवर्ण और सुनार की कुण्डल में समान रुप से प्रधानता है।
नारद इस विवेचन से ब्रह्म प्रकृति से परे सिद्ध होता है।
यही बात दृष्टि में रखकर कुछ लोग ब्रह्म तथा प्रकृति दोनों की समान रुप से नित्यता बताते हैं।
कुछ विद्वानों का कथन है कि ब्रह्म खुद ही पुरुष ता प्रकृति के रुप में प्रकट है।कुछ लोग यह भी कहते हैं कि प्रकृति ब्रह्म से भिन्न है। वह ब्रह्म परमधाम स्वरुप तथा समस्त कारणों का कारण है।उस ब्रह्म का लक्षण श्रुति में इस प्रकार सुना गया है-वह सबका आत्मा है। वह सबसे निर्लिप्त तथा सबका साक्षी है। सर्वत्र व्यापक और सबका आदि कारण है। सर्बब्रह्मस्वरुपिणी प्रकृति उसकी शक्ति है जिससे वह शक्तिमान है अर्थात वह दोनों अभिन्न हैं।
योगीलोग सदा तेजस्वरुप में ही उसका ध्यान करते हैं
परन्तु मेरे भक्तजन ऐसा नहीं मानते।वे उस तेजोमण्डल के भीतर सदा ही साकार ,सर्वात्मा ,स्वेच्छामय मनोहर पुरुष रुप का ध्यान करते हैं।
करोडो़ सूर्यों के समान प्रकाशमान जो तेजोमण्डल है ,उसके भीतर नित्य धाम छिपा है जिसका नाम गोलोक धाम है।(इस धाम का विस्तृत वर्णन व्रह्मवैवर्त
पुराण , गर्गसंहिता में तथा संक्षिप्त वर्णन देवीभागवत पुराण में भी दिया है।)इस नित्य धाम की स्थिति वैकुण्ठ लोक से 50करोड़ योजन ऊपर है।यह मां विरजा नदी से आवेष्टित है। यहां कालिंदी नदी आदि भी हैं,भगवान गोविन्द का वर्णन है ।
आगे भगवान शिव नारद जी को बताते हैं
नारद!श्रीकृष्ण को ही अविनाशी परब्रह्म कहा गया है
वे ही दिव्य स्वरुपधारी सनातन भगवान हैं।वे निर्गुण,निरीह और निराकार परमात्मा हैं तथा प्रकृति से परे हैं।सर्वाधार,सर्वबीज,सर्वज्ञ,सर्वरुप तथा सर्वश्वर
सर्वपूज्य तथा समस्त सिद्धि के दाता हैं।वे आदिपुरुष स्वयं ही द्विभुज रुप धारण करके गोलोक धाम रहते हैं।श्रीकृष्ण रुप से जाने जाते हैं तथा यहां उनकी शक्ति राधा जी हैं।सबके अन्तर्आत्मा ,सर्वत्र प्रत्यक्ष दर्शन देने योग्य तथा सर्वव्यापी हैं। कृष् का अर्थ है 'सब ' और 'ण' का अर्थ है आत्मा।अर्थात वे परब्रह्म सबके आत्मा हैं ,इसी से उन्हें कृष्ण कहा जाता है।
कृष् शब्द सर्व का वाचक है और 'ण ' कार का वाचक है अर्थात वह सर्वत्र व्यापक हैं।
यही ही भगवान अपने एक अंश से वैकुण्ठ लोक में महालक्ष्मी जी के साथ रहते हैं।वैकुण्ठ लोक के अधिपति नारायण देव अपने एक अंश से क्षीरसागर
में शेष शैय्या पर शयन करते हैं। समुद्रकन्या इनकी पत्नी हैं और इन प्रभु को रमापति कहा जाता है।।
इसप्रकार मैंने तुमसे परब्रह्म निरुपण विषयक सब बातें कहीं।वे परमात्मा हम सबके प्यारे तथा वन्दनीय है।इसके बाद नारद जी ने भगवान शंकर का पूजन किया फिर वह भगवान की आज्ञा लेकर नर-नारायण के आश्रम को चले गये।।
अध्याय 28 वां समाप्त(ब्रह्मखण्ड के अन्तर्गत)
श्रुति में प्रकृति का सारभूत लक्षण किस प्रकार सुना जाता है?परमात्मा और प्रकृति दोनों में से सृष्टि में किसकी प्रधानता है?दोनों में कौन बडा़ है? आप मन में विचारकर जो सिद्धांत हो,वह बताइऐ।
नारद जी बात सुनकर भगवान शंकर हँस पडे़ और उन्होंने परब्रह्म परमात्मा तत्व का निरुपण करना शुरु किया।
महादेव जी बोले- वत्स नारद!तुमने जो -2 पूछा है ,वह उत्तम गूढ़ ज्ञान का विषय है।वेदों और पुराणों में भी वह उत्तम ज्ञान बडा़ दुर्लभ है। मैंने ब्रह्मा ,विष्णु, शेष
धर्म और महाविराट -इन सबने और श्रुतियों ने भी सब बातों का निरुपण किया है।नारद जी !जो सविशेष तथा प्रत्यक्ष दृश्यतत्व है,उसका हम लोगों ने वेद में निरुपण किया है।
बहुत समय पहले की बात है ,वैकुण्ठधाम में मैंने,ब्रह्मा जी और धर्म ने हरि के सामने यह प्रश्न उपस्थित किया था।उस समय उन्होंने जो उत्तर दिया था ,वह सुनो-
सनातन परब्रह्म, परमात्म स्वरुप है। वह समस्त कर्मों के साक्षी रुप से समस्त प्राणियों के शरीरों में स्थित है ।प्रत्येक शरीर में पांच प्राणों के रुप में साक्षात भगवान विष्णु विराजमान हैं,मन के रुप में ब्रह्मा जी,सम्पूर्ण ज्ञान(बुद्धि) के रुप में स्वयं मैं,और शक्ति के रुप में साक्षात ईश्वरीय प्रकृति विराजमान है।हम सबके सब परमात्मा के आधीन हैं। शरीर में उसके स्थित होने पर स्थित रहते और शरीर छोड़कर जाने पर हम भी पीछे -2चले जाते हैं जैसे राजा के सेवक सदा ही राजा का अनुसरण करते हैं ,वैसे ही हम लोग भी परमात्मा के अनुगामी बने रहते हैं।जीव परमात्मा का प्रतिविम्व हैं।वही कर्मों के फल का उपभोग करता है।जैसे जल से भरे हुऐ घडो़ं में पृथक्-2 सूर्य और चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब होता है।तथा उन घडो़ के फूट जाने पर वह प्रतिबिम्ब वापस सूर्य तथा चंद्रमा में लीन हो जाता है,उसी प्रकार सृष्टिकाल में भी परमात्मा के प्रतिविम्वस्वरुप जीव की उपलब्धि होती है। तथा सृष्टिमयी उपाधि के नष्ट हो जाने पर वह प्रतिविम्ब रुप जीव पुनः उस सर्वव्यापी परमात्मा में लीन हो जाता है।
वत्स संसार का संहार हो जाने पर एकमात्र मूल परमात्मा ही शेष रह जाता है।हम तथा यह चराचर जगत उसी में लीन हो जाते हैं।वह ब्रह्म मण्डलाकार ज्योतिपुज्जस्वरुप है।
ग्रीष्म ऋतु के मध्याह्नकाल में प्रकट होने वाले कोटि-2 सूर्यों के समान उसका प्रकाश है।वह आकाश के समान विस्तृत ,सर्व व्यापक तथा अविनाशी है।योगीजनों को ही वह चन्द्रमण्डल के समान शीतल दिखाई देता है।योगीजन उसे सनातन परब्रह्म कहते हैं और दिन -रात उस मंगलमय सतस्वरुप परमात्मा का ध्यान करते हैं।
वह परमात्मा निरीह,निराकार तथा सबका ईश्वर है।उसका स्वरुप उसकी इच्छा के अनुसार है। वह स्वतंत्र तथा समस्त कारणों का भी कारण है। परमानन्दस्वरुप ता परम आनन्द के प्राति का हेतु है।वह सबसे उत्कृष्ट ,प्रधान पुरुष ,प्राकृत गुणो से रहित तथा प्रकृति से परे स्थित है।प्रलय के समय उसी में सर्बबीजस्वरुपिणी प्रकृति लीन होती है।ठीक उसी तरह जैसे अग्नि में उसकी दाहिका शक्ति ,सूर्य में उसकी प्रभा ,दुग्ध में धवलता और जल में शीतलता रहती है।
मुने! जैसे पृथ्वी में गन्ध ,आकाश में शब्द सदा ही विद्यमान है,उसी तरह निर्गुण ब्रह्म में निर्गुण प्रकृति सदा स्थित है।जब ब्रह्म सृष्टि के लिऐ उन्मुख होता है,तब अपने अंश से पुरुष कहलाता है। वत्स!वही गुणों-विषयों से सम्बन्ध रखने पर प्राकृत तथा विषयी कहा जाता है।
त्रिगुणा प्रकृति उस परमात्मा में उत्कृष्ट छायारुपिणी मानी गयी है।नारद जी! जैसे कुम्हार मिट्टी से घडा़ बनाने में हमेशा ही समर्थ होता है,उसी प्रकार वह ब्रह्म प्रकृति के द्वारा सृष्टि निर्माण करने में सदा ही समर्थ है।जैसे कुमार मिट्टी का निर्माण नही करता,मिट्टी उसके लिऐ सनातन और नित्य है तथा जैसे सुनार सुवर्ण की सृष्टि नहीं करता,स्वर्ण उसके लिऐ नित्य ही है। उसी प्रकार वह परब्रह्म परमात्मा नित्य है तथा उसकी प्रकृति भी नित्य मानी गयी है।इसी से कुछ लोग सृष्टि में दोनों की समान प्रधानता मानते हैं ।
कुम्हार और सुनार क्रमशः मिट्टी तथा स्वर्ण पैदा करके लाने में समर्थ नहीं है तथा मिट्टी ,स्वर्ण भी कुम्हार व सुनार लाने की सामर्थ नहीं रखते।अतः मिट्टी और कुम्हार की घट में तथा सुवर्ण और सुनार की कुण्डल में समान रुप से प्रधानता है।
नारद इस विवेचन से ब्रह्म प्रकृति से परे सिद्ध होता है।
यही बात दृष्टि में रखकर कुछ लोग ब्रह्म तथा प्रकृति दोनों की समान रुप से नित्यता बताते हैं।
कुछ विद्वानों का कथन है कि ब्रह्म खुद ही पुरुष ता प्रकृति के रुप में प्रकट है।कुछ लोग यह भी कहते हैं कि प्रकृति ब्रह्म से भिन्न है। वह ब्रह्म परमधाम स्वरुप तथा समस्त कारणों का कारण है।उस ब्रह्म का लक्षण श्रुति में इस प्रकार सुना गया है-वह सबका आत्मा है। वह सबसे निर्लिप्त तथा सबका साक्षी है। सर्वत्र व्यापक और सबका आदि कारण है। सर्बब्रह्मस्वरुपिणी प्रकृति उसकी शक्ति है जिससे वह शक्तिमान है अर्थात वह दोनों अभिन्न हैं।
योगीलोग सदा तेजस्वरुप में ही उसका ध्यान करते हैं
परन्तु मेरे भक्तजन ऐसा नहीं मानते।वे उस तेजोमण्डल के भीतर सदा ही साकार ,सर्वात्मा ,स्वेच्छामय मनोहर पुरुष रुप का ध्यान करते हैं।
करोडो़ सूर्यों के समान प्रकाशमान जो तेजोमण्डल है ,उसके भीतर नित्य धाम छिपा है जिसका नाम गोलोक धाम है।(इस धाम का विस्तृत वर्णन व्रह्मवैवर्त
पुराण , गर्गसंहिता में तथा संक्षिप्त वर्णन देवीभागवत पुराण में भी दिया है।)इस नित्य धाम की स्थिति वैकुण्ठ लोक से 50करोड़ योजन ऊपर है।यह मां विरजा नदी से आवेष्टित है। यहां कालिंदी नदी आदि भी हैं,भगवान गोविन्द का वर्णन है ।
आगे भगवान शिव नारद जी को बताते हैं
नारद!श्रीकृष्ण को ही अविनाशी परब्रह्म कहा गया है
वे ही दिव्य स्वरुपधारी सनातन भगवान हैं।वे निर्गुण,निरीह और निराकार परमात्मा हैं तथा प्रकृति से परे हैं।सर्वाधार,सर्वबीज,सर्वज्ञ,सर्वरुप तथा सर्वश्वर
सर्वपूज्य तथा समस्त सिद्धि के दाता हैं।वे आदिपुरुष स्वयं ही द्विभुज रुप धारण करके गोलोक धाम रहते हैं।श्रीकृष्ण रुप से जाने जाते हैं तथा यहां उनकी शक्ति राधा जी हैं।सबके अन्तर्आत्मा ,सर्वत्र प्रत्यक्ष दर्शन देने योग्य तथा सर्वव्यापी हैं। कृष् का अर्थ है 'सब ' और 'ण' का अर्थ है आत्मा।अर्थात वे परब्रह्म सबके आत्मा हैं ,इसी से उन्हें कृष्ण कहा जाता है।
कृष् शब्द सर्व का वाचक है और 'ण ' कार का वाचक है अर्थात वह सर्वत्र व्यापक हैं।
यही ही भगवान अपने एक अंश से वैकुण्ठ लोक में महालक्ष्मी जी के साथ रहते हैं।वैकुण्ठ लोक के अधिपति नारायण देव अपने एक अंश से क्षीरसागर
में शेष शैय्या पर शयन करते हैं। समुद्रकन्या इनकी पत्नी हैं और इन प्रभु को रमापति कहा जाता है।।
इसप्रकार मैंने तुमसे परब्रह्म निरुपण विषयक सब बातें कहीं।वे परमात्मा हम सबके प्यारे तथा वन्दनीय है।इसके बाद नारद जी ने भगवान शंकर का पूजन किया फिर वह भगवान की आज्ञा लेकर नर-नारायण के आश्रम को चले गये।।
अध्याय 28 वां समाप्त(ब्रह्मखण्ड के अन्तर्गत)
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