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मुकेश जोशी जी के प्रश्न का उत्तर

ब्रह्म वैवर्त  पुराण ,देवी भागवत पुराण और शिवपुराण तथा गर्ग संहिता 
में भी परमात्मा विष्णु देव को गोविन्द देव (कृष्ण)  का पूर्ण अंश माना गया है। यह दोनों सभी अंशों में समान हैं न कोई छोटा है और न कोई बडा़। अंतर केबल इतना है कि विष्णु क्षणिक अभिव्यक्ति हैं ।।
और गोविन्द देव सनातन हैं।।  
यही मत शिवजी का भी है।लगभग सारे पुराण यही बताते हैं कि कृष्ण और राम विष्णु देव का पूर्ण रूप  अर्थात स्वयं विष्णु हैं ।।सृष्टिकर्ता विष्णु देव का उन गोलोकवासी कृष्ण के साथ अभेद सम्बंध है लेकिन यहां विष्णु से तात्पर्य वैकुण्ठनाथ नारायण देव से है न कि श्वेतद्वीप वासी विष्णु।
दूसरे इनका काम जगत का भरण पोषण करना है और यही परमात्मा लोकों में पुरुषोत्तम नाम से प्रसिद्ध हैं और भागवत में भी माता देवकी और वसुदेव के समक्ष कृष्ण चतुर्भज विष्णु के रुप में  हुऐ ।।
अतः विष्णु जी ही राम(कृष्ण) के पूर्ण स्वरुप हैं ।राम शब्द का मतलव ऐसा स्वरुप जिसमें योगीजन रमण करते हैं ।विष्णु देव का योग में  ध्यान किया जाता हैं।
यही विष्णु रावण को मारने हेतु राम स्वरुप धारण करते हैं।आपका 
सवाल बहुत ही उचित है कारण कि परात्पर ब्रह्म का किसी कल्प विशेष में राम स्वरुप धारण करना और फिर कल्प-2में विष्णु का राम रुप होना
इसका केबल और केबल एक ही मतलव है कि विष्णु ही उन परमेश्वर 
के पूर्ण स्वरूप है।।
राजा अम्बरीष की कथा के सन्दर्भ में 
विष्णु द्वारा खुद को परम स्वतंत्र बताया जाना (स्वयं को गोलोक निवासी भी कहा)इसका परम प्रमाण है
आशा है इससे आपकी शंका दूर हो सकेगी।
देरी से उत्तर देने के लिऐ क्षमा करें।।
आप जैसे विद्वान पुरुषों का इस ब्लोग पर स्वागत है,अभिनंदन है
आपको सादर नमस्कार है।।

टिप्पणियाँ

Unknown ने कहा…
धन्यवाद परात्पर परमब्रह्म राम को कई उपनिषद संहिताओं मे परमपुरुष कहा गया है श्री नारायण जो महावैकुण्ठ के ईश्वर हैँ और श्री गोलोक के ईश्वर श्री राधा कृष्ण इन्ही परमब्रह्म राम के क्रमशः माधुर्य भाव और ऐश्वर्य भाव की इच्छा से साकार रूप में प्रकट हुए इन्ही तीनो रुपों को परमेश्वर की त्रिपाद विभूति कहा गया है विष्णु तीन रूपों से परमधाम मे स्थित हैँ और उनका चतुर्थ रूप अनिरुद्ध नारायण रूप से ब्रह्मांडो का सृजन करता है कबीर दास जी ने महावैकुण्ठ के महाविष्णु रूप को ही सत्पुरुष कहा है इन्ही को क्षर ब्रह्म भी कहा गया है इन्ही के लोक को सत या सत्य लोक कहा है इसीलिए इनका नाम सत्य नारायण भी है क्युकी प्राकृति प्रलय मे महावैकुण्ठ के महाविष्णु, शिवलोक के सदाशिव, मणिद्वीप की आदिशक्ति सहित सम्पूर्ण लोको का नाश करके अक्षर ब्रह्म अर्थात परमात्मा श्री कृष्ण के विग्रह मे लीन हो जाते हैँ और प्रकृति प्रलय के बाद पुनः श्री कृष्ण से प्रकट होके नयी सृस्टि करते हैँ इन्ही श्री कृष्ण को गोलोक नाथ गोविन्द और अक्षर ब्रह्म और इनके लोक को कबीर जी अकह लोक कह गए हैँ और इन दोनों से परे जो अन्य रूप है उसे ही अनामि पुरुष, अक्षरतीत, अखंड अनादि रामचंद्र कहा है कबीर के निर्गुण राम यही हैँ इनके धाम को ही नित्य अयोध्या या साकेत लोक, अमर लोक, नापैद आदि नाम से कहा गया है गोलोक इसकी साकेत पूरी के बाहरी आवरण मे प्रकट हुआ इस धाम की लीला का प्रतिभास ही गोलोक की लीला है इसी धाम मे अनगिनत ब्रह्मा विष्णु शिव, दुर्गा के अतिरिक्त लाखों महाविष्णु, लाखों सदाशिव, लाखों नरसिंघ वराह परमेश्वर से प्रकट होते हैँ और उन्ही के विस्तार रूप मे अलग अलग ब्रह्मांडो को जाते हैँ. बृहद संहिता, सदाशिव संहिता, शुक संहिता, राम रहस्य उपनिषद सभी मे इस नित्य लीला का संकेत है. इन्ही को अक्षर और क्षर का मूल अक्षरातीत पुरुषोत्तम परमात्मा कहा गया है गुरु ग्रन्थ साहिब मे इसी को सचखंड कहा है पुराण केवल गोलोक तक का वर्णन करते हैँ किन्तु अन्य कई ग्रंथो वेदो, संहिताओं,उपनिषद मे कहीं कहीं गुप्त रूप से अयोध्या को ही नित्य साकेत और मूल परमात्मा का स्थान कहा गया है पदम पुराण मे महावैकुण्ठ के चतुर्भुज राम नारायण प्रभु के धाम को भी अयोध्या कहा गया है जो परमब्रह्म राम के ही त्रिपाद रूपों मे तीसरे रूप हैँ अयोध्या हर लोक मे स्थित है स्वर्ग लोक मे भी एक अयोध्या है जिसे अमरावती भी कहा गया है और पृथ्वी पे भी कौशल पूरी को अयोध्या कहा गया है
जीव का जब सम्पूर्ण मोक्ष हो जाता है तब गोलोक मे श्री कृष्ण उसे परम हंस रूप देके अयोध्या या साकेत के लिए गति प्रदान करते हैँ.. यहाँ नाम मम श्याम है वहां नाम मम राम. मेरा संशय इन ग्रंथो और कबीर नानक तुलसी जी के ज्ञान से दूर हो गया की हम सभी नित्य साकेत के प्रभु की प्रिय आत्माएं हैँ जो काल और माया के प्रभाव मे इन ब्रह्मांडो मे फंस गयी हैँ और मालिक का नाम अर्थात राम का नाम ही फंद छुड़ाएगा. नित्य प्रभु राम ने ही धाम धनीयों के रूप मे अपना विस्तार किया है ताकि प्रिय आत्माओ को इन रूपों से आकर्षित कर काल के जाल से निकाल के वापस धाम लें आए.. काल सत पुरुष अर्थात श्री राम नारायण का सोलह पुत्रो मे से एक है ब्रह्म वैवर्त पुराण के अनुसार इसी को कारणवासी महाविष्णु कहा है जिसके तप से प्रसन्न होके श्री कृष्ण ने उसे अनंत ब्रह्मांडो के सृजन का वर दिया और जीवो को माया आकर्षित करके इसी काल के देश मे लें आयी. इसी से त्रिगुण अर्थात ब्रह्मा विष्णु शिव पैदा हुए और जीवो को जन्म मरण के चक्र मे उलझा देते हैँ जब तक सत नाम की शरण नहीं जाता जीव तब तक इन त्रिगुणो से धोखा खाता रहेगा काल और माया ने चालाकी से इन त्रिगुणो को प्रभु के त्रिपादभूति सच्चिदानंद रुपों यानि महाब्रह्मा, महाविष्णु और सदाशिव के रूप मे ही बनाया और इन त्रिगुणो ने जीवो को भ्रम मे रखा है इसलिये कहीं भी गुरु ग्रन्थ साहेब मे कबीर ग्रंथो मे या राम चरित मानस मे विष्णु और विष्णु अवतार राम, कृष्ण या शिव के नाशवान होने के बात आयी है तो कहीं परमेश्वर के चतुर्भुज, नीलमणि, कमल नयन सारंग पानी, मुरली धर कहके स्तुति की गयी है. इसका अर्थ परमात्मा के सच्चिदानंद रूपों का प्रतिभास रूप ही त्रिगुण धारण करते हैँ महामाया की इच्छा से इसलिये ब्रह्माण्ड मे सब माया और उसके रूप ही हैँ इसलिये कबीर माया को महाठगनी कह रहे हैँ तुलसीदास इसे बाघिन और पिशाचनी कह रहे हैँ. इससे केवल संत ही राम नाम देके बचा सकते हैँ अन्य कोई नहीं.
Sandeep sihare ने कहा…
मैं समझता हुं कि जैसा कि बीजक में कबीर साहब के उपासक वीरसिंह बघेल ने श्री रामचन्द्र जी का स्थान गोलोक के मध्य स्थित साकेत को माना है (जो कि दिव्य व्योम में है )
अब वेद सार उपनिषद में प्रथम अध्याय , श्लोक नंबर 0३ एवम् ०४ से

विरजायाः परेपारेलोकोवैकुण्ठसंज्ञितः।तन्मध्येराजतेयोध्या सच्चिदानन्दरूपिणी।।03

तत्रलोकोचतुर्बाहू
रामोनारायण प्रभुः। अयोध्यायांयदाचास्य अवतारोभवेदिह।।04

एवम् पद्म पुराण में भी त्रिपाद विभूति में वैकुंठ के मध्य अयोध्या अर्थात साकेत नगरी विद्यमान मानी गई है।(शिव जी अनुसार)
सो यह जो वैकुंठ है ,गोलोक क्षेत्र में ही है,कारण की गोलोक दिव्य व्योम अर्थात त्रिपाद विभूति से व्याप्त है।

इससे तो यही स्पष्ट है कि श्री राम नारायण ही मूल परमेश्वर हैं और फिर स्वयं माता पार्वती से शिव ने श्री विष्णु तत्व स्पष्ट किया है ,वह भला आधा- अधूरा ज्ञान क्यों बताएंगे
उन्होंने कुल चार दिव्य क्षेत्र बताएं हैं,जो इस प्रकार से है - महा वैकुंठ,वैष्णव लोक अर्थात गोलोक,श्वेतद्वीप एवम् क्षीर सागर।
इसके अतिरिक्त महा नारायण उपनिषद में त्रिपाद विभूति के अंतर्गत आनंद पाद के मध्य दिव्य वैकुंठ है ,जिसमें विराजमान नारायण देव के एक नख का प्रकाश अरबों खरबों सूर्य एवम् चंद्र के प्रकाश जैसा है।
इसी उपनिषद में श्री नारायण को तामस अंधकार से परे अर्थात भौतिक प्रकृति से परे दिव्य धाम का रहवासी कहा है एवम् वेदों में भी ऐसे ही वचन मिलते हैं।
श्री कृष्ण ने भी परमेश्वर को भौतिक प्रकृति से परे दिव्य लोक में स्थित बताया है।
महेश्वर तंत्र भी श्री कृष्ण को दिव्य ब्रह्मपुर वासी मानता है,यह अयोध्या ही है।
वेदों में अयोध्या को ही दिव्य ब्रह्मपुर कहा गया है


अतिशय तेज (असंख्यों सूर्य) से प्रकाशमान, अति मनोहारिणी, यशोरूप तेज से चारों ओर से घिरी हुई, अति तेजस्विनी, किसी से भी न जीती गई उस ब्रह्मपुरी में ब्रह्म प्रवेश किए हुए हैं । (अथर्ववेद १०/२/३३)

आठ चक्रों और नवद्वारों से युक्त, अपने आनन्द स्वरूप वालों की, किसी से युद्ध के द्वारा विजय न की जाने वाली (अयोध्या) पुरी है । उसमें तेज स्वरूप कोश सुख स्वरूप है, जो ज्योति से ढका हुआ है (अथर्ववेद १०/२/३१) ।

अब जो विराट स्वरूप अर्थात अनंत नेत्र ,पैर,भुजा आदि स्वरूप बताया है ,वह तो नारायण स्वरूप ही है।वह अकेले ही धरती ,स्वर्ग आदि को उत्पन्न करता है,उसका आश्रय लेने से मोक्ष हो जाता है।
इन सब कारणों से स्पष्ट है कि मूल परमात्मा पद्म पुराण में वर्णित राम नारायण ही हैं।







Unknown ने कहा…
Hello bro
TARAK BRAHM HI PARAM TATVA H. PARAM BRAHM H. PRATPAR BRAHM H. PARAMDHAM H.
SAARE AVTAR ME, SABHI KE HEART ME, SABHI BRAHMAND ME VYAPT H.
WHI SHREE RAM H
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SHIRSAGAR WASI
VAIKUNTHA WASI
SWATDEEP WASI
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SAMBHU VIRANCHI VISHNU BHAGWAANA UPJAHI JASU ANSH TE NANA.
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GEETA ME GOLOK AVINASI BTAYA H. WHI TAK JANA H MANUSYO KO. JO GURU KI KRIPA PAR H. SATSANG HI SARAL UPAY H.