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दिव्य ब्रह्म ज्ञान

सूर्यदेव ने ब्रह्मा जी से कहा कि-
"वे परमात्मा सभी प्राणियों मे ं व्याप्त,अचल,नित्य,सूक्ष्म तथा इंद्रियों से अतीत हैं।उन्हें क्षत्रज्ञ,पुरुष,हिरण्यगर्भ,महान,प्रधान ,बुद्धि आदि अनेक नामों से अभिहित किया जाता है।जो तीनों लोकों के एकमात्र आधार हैं,वे निर्गुण होकर भी अपनी इच्छा से सगुण हो जाया करते हैं।सबके साक्षी हैं,स्वतः कोई कर्म नहीं करते  और न ही कर्म फल प्राप्ति में संलिप्त रहते हैं। बे परमात्मा सब ओर नेत्र,हाथ ,पैर ,नासिका ,कान तथा मुख वाले हैं।वे समस्त जगत को आच्छादित करके आवस्थित हैं
।तथा समस्त प्राणियों में स्थित रहकर स्वछन्द विचरण करते हैं।
शुभ -अशुभ कर्मरुप  बीजवाला   क्षेत्र  कहलाता है़।इसे जानने के कारण वह परमात्मा क्षेत्रज्ञ कहलाता हैं।वे अव्यक्तपुर में शयन करने के कारण पुरुष,बहुत रुप धारण करने से विश्वरुप,धारण-पोषण करने के कारण महापुरुष कहे जाते हैं।ये ही अनेक रुप धारण करते हैं।
जिस प्रकार एक दीप से अनेक दीप प्रज्वलित हो जाते हैं,उसी प्रकार एक परमात्मा  से संपूर्ण जगत उत्पन्न होता है।जब वह अपनी इच्छा से संसार का संहार करता है,तब फिर एकाकी ही रह जाता है।परमात्मा को छोड़कर कोई भी स्थावर-जंगम पदार्थ  नित्य नहीं  है,क्योंकि  वे अक्षय,अप्रमेय,और सर्वज्ञ कहे जाते हैं।उनसे बड़कर कोई दूसरा नहीं है ।वे ही पिता ,वे ही प्रजापति हैं,सारे देवता और असुर उनकी वंदना करते हैं।वे सर्वग़त होते हुऐ भी  निर्गुण  हैं।उसी आत्मस्वरुप परमेश्वर का मैं भजन करता हूँ।

अध्याय६६-६७(ब्राह्म 
यह सारा ज्ञान साक्षात सूर्य देव द्वारा भगवान ब्रह्मा जी को दिया गया (भविष्यपुराण )

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