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- ॐ एक बार सनक आदि महर्षियों ने भगवान श्री ब्रह्मा जी की स्तुति करके उनसे पूछा,देव! सर्व प्रधान देवता कौन है और उनकी शक्तियां कौन -२ सी हैं? यह सुनकर ब्रह्मा जी बोले- सुनो ,किन्तु इस गोपनीय रहस्य को किसी से कहना नहीं, किसी अरे गैरों को नहीं सुनाना चाहिए। जो सज्जन हो, गुरु भक्त हो उसे सुना सकते हैं।
भगवान हरि श्री कृष्ण ही परम देवता है,बे छह ऐश्वर्यों से पूर्ण भगवान गोप और गोपियों के सेव्य तथा श्री तुलसी देवी से आराधित एवम् वृंदावन के अधिश्वर हैं।
वे ही एकमात्र सर्वेश्वर हैं।उन्हीं श्री हरि के एक रुप भगवान नारायण भी हैं जो कि अखिल ब्रह्मांडो के अधीश्वर हैं। ये श्रीकृष्ण प्रकृति से भी पुरातन और नित्य हैं।उनकी आल्हादिनी,संधिनी,इच्छा, ज्ञाना और क्रिया आदि बहुत से शक्तियां हैं।
उनमें आल्हादिनी सर्वप्रधान हैं ।ये ही परम रहस्यमय श्री राधा हैं। कृष्ण इनकी आराधना करते हैं, इसलिए ये राधा है अथवा हमेशा कृष्ण की आराधना करती है,इसलिए राधिका कहलाती है।
श्री राधा को गंधरवा भी कहते हैं, बृज की गोप कन्याएं, द्वारका की समस्त कृष्ण महर्षिया, और श्री लक्ष्मी जी, श्रीराधिका जी की अंश रूपा हैं। राधा व श्री कृष्ण रस सागर एक होते हुए ही शरीर से क्रीड़ा के लिए 2 हो गए हैं।
ए श्री राधिका जी भगवान हरि की सर्वेश्वरी, संपूर्ण सनातनी विद्या हैं और श्रीकृष्ण के प्राणों की अधिष्ठात्री देवी हैं। वेद एकांत में है इनकी ऐसी ही स्तुति किया करते हैं । इनकी महिमा का मैं अपने संपूर्ण जीवन में वर्णन नहीं कर सकता। जिस पर इनकी कृपा होती है , परमधाम उसके हाथ में आ जाता है।
राधा को ना जानकर जो श्री कृष्ण की आराधना करना चाहता है वह महामूर्ख है। सुरतिया इनके इन नामों का गान करती हैं।
राधा , रासेश्वरी, रम्या, कृष्ण मंत्र अधिदेवता, सर्वअध्या, सर्ववंद्या वृंदावन विहारिणी, वृंदाराध्या, रमा, अशेशगोपिमंडलपुजिता, सत्या , सत्य पर , सत्यभामा, श्रीकृष्णबल्लभा, वृषभानुसुता, गोपी, ईश्वरी, मूल प्रकृति, गंधरवा, राधिका, अरम्या, रुक्मणि,परमेश्वरी, परात पर, पूर्णा, भक्ति मुक्ति प्रदा, पूर्णचंद्रनिभानना, भव्व्याधि विनाशिनी। इन
28 नामों का जो पाठ करते हैं।,वे जीवन से मुक्त हो जाते हैं,ऐसा ब्रह्मा जी का कहना है। इस प्रकार श्री राधा जी का वर्णन पूरा हुआ, अब दूसरी(संधिनी)शक्ति का विवरण देते हैं जो इस प्रकार है-
यह शक्ति धाम,भूषण,शय्या और आसन आदि तथा मित्र, भृत्य आदि के रूप में परिणत होती हैं और मृत्यु लोक में अवतार समय माता पिता के रूप में परिणत हो जाती है। यही अनेक अवतारों की कारण है।
ज्ञान शक्ति को ही क्षेत्रज्ञ शक्ति कहते हैं। और इच्छाशक्ति के अंतर्गत माया शक्ति आती है। यह सत्य,रज और तमोगुण रूपा है। बहिरंग और जड़ है , यह अनंत कोटि ब्रह्मांड की रचना करती है ,यह माया और अविद्या रूप से जीव का बंधन करती है। क्रिया शक्ति को ही लीला शक्ति कहते हैं।
जो इस उपनिषद को पढ़ते हैं वह अवृत्ति भी वृत्ति हो जाते हैं। तथा वे राधा कृष्ण के प्रिए होते हैं और अपनी दृष्टि से पवित्र कर देते हैं। ओम तत्सत।
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