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श्री रूद्र को युगल मंत्र की प्राप्ति(पद्म पुराण)


(भगवान शिव  और देवर्षि नारदजी के बीच संवाद- पाताल खंड
पद्मपुराण)

पूर्व काल की बात है मैं(भगवान शिव) कैलाश पर्वत के  शिखर पर सघन वन में रहता था और श्री नारायण का ध्यान करते हुए उनके श्रेष्ठ मंत्र का जप करता था। इससे संतुष्ट होकर भगवान प्रकट हुए और बोले-बर मांगो, उनके यों कहने पर मैंने आंखें खोल कर देखा - श्री भगवान अपनी प्रिया के साथ गरुड़ पर विराजमान थे। मैंने बारंबार प्रणाम करके लक्ष्मीपति से कहा-कृपासिंधु आपका जो रूप परम आनंद दायक , संपूर्ण आनंदो का आश्रय , नित्य विग्रह , सबसे श्रेष्ठ  निर्गुण, निष्क्रिय और शांत है जिसे विद्वान पुरुष ब्रह्म कहते हैं, उसको मैं अपने नेत्रों से देखना चाहता हूं। यह सुनकर भगवान कमलापति में अपने शरणागत भक्त मुझसे कहा-महादेव! तुम्हारे मन में मेरी जिस रूप को देखने की इच्छा है उसका अभी दर्शन करोगे। यमुना नदी के पश्चिम तट पर मेरा लीलाधाम वृंदावन है,वही  चले जाओ। यूं कह कर वे जगदीश्वर अपने शक्ति के साथ अंतर्ध्यान हो गए। तब मैं भी यमुना के सुंदर तट पर चला आया। वहां मुझे संपूर्ण देवेश्वर के भी  ईश्वर श्री कृष्ण के दर्शन हुए, जो किशोरावस्था से युक्त,  कमनीय गोपी वेष धारण किए, अपनी प्रिया की कंधे पर  बाया हाथ रखकर खड़े थे। उनकी वह झांकी अत्यंत मनोहर जान पड़ती थी। चारों ओर गोपियों का समुदाय खड़ा था और  बीच में भगवान श्री कृष्ण राधा देवी को हंसाते हुए खुद हंस रहे थे। उनका विग्रह मेघ के समान श्याम वर्ण और संपूर्ण गुणों का धाम था। श्री कृष्ण मुझे देखकर हंसे और बोले- रुद्र ! तुम्हारा मनोरथ जानकर आज मैंने तुम्हें दर्शन दिया। इस समय मेरे जिस अलौकिक रूप का दर्शन तुम कर रहे हो वह निर्मल प्रेम का पुंज है,इसके रूप में सत, चित् और आनंद ही मूर्तिमान हुए हैं। उपनिषदों के समूह मेरे इसी स्वरूप को निराकार, निर्गुण,व्यापार ,निष्क्रिय और  श्रेष्ठतम बतलाते हैं। मेरे दिव्य गुणों का अंत नहीं है और कोई उन्हें सिद्ध नहीं कर सकता। इसलिए वेदांत शास्त्री मुझे ईश्वर को निर्गुण कहते हैं। मेरा यह रूप इन आंखों से नहीं देखा जा सकता इसलिए शास्त्र मुझे अरूप- निराकार कहते हैं।
मैं अपने चेतनया अंश से सर्वत्र व्यापक हूं इसलिए विद्वान लोग मुझे ब्रह्म कहकर पुकारते हैं। मैं इस प्रपंच का करता नहीं हूं अतः मुझे निष्क्रिय कहा जाता है। रूद्र! मेरे अंश  ही  माया - मय गुणों से सृष्टि आदि कार्य करते हैं। मै स्वयं कुछ भी नहीं करता हूं। मैं तो इन गोपियों के प्रेम में  आनंद मग्न होकर न तो दूसरी कोई क्रिया जानता हूं और न मुझे अपने आप का भान रहता है
ये मेरी प्रिया श्री राधिका हैं,इन्हे तुम परा देवता समझो। मैं इनके प्रेम के वशीभूत होकर सदा इन्हीं के साथ विचरण करता हूं इनकी जो सखियां हैं ,वे सब नित्य हैं। जैसे मेरा विग्रह  नित्य है, वैसा उनका भी है। मेरे सखा, मित्र,पिता  और गोपियां वृंदावन सब नित्य हैं।इनका स्वरूप चिद आनंदरस ही है।मेरे इस वृंदावन का नाम आनंदकंद समझो।इसमें प्रवेश करने से संसार में नहीं आना पड़ता। मैं वृंदावन को छोड़कर कहीं नहीं जाता।अपनी प्रिया के साथ सदा यहीं निवास करता हूं।तुम्हारे मन में जो कुछ जानने की लालसा थी,वह सब मैंने आपको बता दिया।
बोलो और अब क्या सुनना चाहते हो?तब मैंने श्री कृष्ण से कहा -भगवान आपके स्वरूप की प्राप्ति कैसे हो सकती है?इसका उपाय मुझे बताइए। श्री कृष्ण ने कहा -रुद्र !तुमने बहुत उत्तम बात पूछी है। किंतु यह विषय बहुत रहस्य का है अतः इसे गुप्त रखना चाहिए।

जो दूसरे उपायों का भरोसा छोड़ कर एक बार हम दोनों की शरण में आ जाता है और गोपी भाव से मेरी उपासना करता है, वही मुझे पा सकता है।जो एक बार मै आपका हूं ऐसा बोलकर मेरी शरण में आता है,वह मुझे बिना साधन के ही पा लेता है,इसमें कोई शक नहीं है।इसके बाद भगवान शिव ने मेरे दाहिने कान में युगल मंत्र(चिंतामणि मंत्र) का उपदेश दिया और फिर अपने भक्तों के साथ अंतर्ध्यान हो गए।

(भगवान शिव  और देवर्षि नारदजी के बीच संवाद- पाताल खंड
पद्म पुराण) 

विशेष सूचना- "यहां पर स्वयं श्री कृष्ण ने  बताया है  कि उनका विग्रह सच्चिदानंदमय है ,वह निर्गुण निराकार ब्रह्म हैं ।वह ब्रहांडो की रचना आदि कार्य स्वयं नहीं करते बल्कि उनके अंश ही करते हैं।




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