- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप
Featured post
- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप
(भगवान शिव और देवर्षि नारदजी के बीच संवाद- पाताल खंड
पद्मपुराण)
मैं अपने चेतनया अंश से सर्वत्र व्यापक हूं इसलिए विद्वान लोग मुझे ब्रह्म कहकर पुकारते हैं। मैं इस प्रपंच का करता नहीं हूं अतः मुझे निष्क्रिय कहा जाता है। रूद्र! मेरे अंश ही माया - मय गुणों से सृष्टि आदि कार्य करते हैं। मै स्वयं कुछ भी नहीं करता हूं। मैं तो इन गोपियों के प्रेम में आनंद मग्न होकर न तो दूसरी कोई क्रिया जानता हूं और न मुझे अपने आप का भान रहता है
ये मेरी प्रिया श्री राधिका हैं,इन्हे तुम परा देवता समझो। मैं इनके प्रेम के वशीभूत होकर सदा इन्हीं के साथ विचरण करता हूं इनकी जो सखियां हैं ,वे सब नित्य हैं। जैसे मेरा विग्रह नित्य है, वैसा उनका भी है। मेरे सखा, मित्र,पिता और गोपियां वृंदावन सब नित्य हैं।इनका स्वरूप चिद आनंदरस ही है।मेरे इस वृंदावन का नाम आनंदकंद समझो।इसमें प्रवेश करने से संसार में नहीं आना पड़ता। मैं वृंदावन को छोड़कर कहीं नहीं जाता।अपनी प्रिया के साथ सदा यहीं निवास करता हूं।तुम्हारे मन में जो कुछ जानने की लालसा थी,वह सब मैंने आपको बता दिया।
बोलो और अब क्या सुनना चाहते हो?तब मैंने श्री कृष्ण से कहा -भगवान आपके स्वरूप की प्राप्ति कैसे हो सकती है?इसका उपाय मुझे बताइए। श्री कृष्ण ने कहा -रुद्र !तुमने बहुत उत्तम बात पूछी है। किंतु यह विषय बहुत रहस्य का है अतः इसे गुप्त रखना चाहिए।
जो दूसरे उपायों का भरोसा छोड़ कर एक बार हम दोनों की शरण में आ जाता है और गोपी भाव से मेरी उपासना करता है, वही मुझे पा सकता है।जो एक बार मै आपका हूं ऐसा बोलकर मेरी शरण में आता है,वह मुझे बिना साधन के ही पा लेता है,इसमें कोई शक नहीं है।इसके बाद भगवान शिव ने मेरे दाहिने कान में युगल मंत्र(चिंतामणि मंत्र) का उपदेश दिया और फिर अपने भक्तों के साथ अंतर्ध्यान हो गए।
(भगवान शिव और देवर्षि नारदजी के बीच संवाद- पाताल खंड
पद्म पुराण)
विशेष सूचना- "यहां पर स्वयं श्री कृष्ण ने बताया है कि उनका विग्रह सच्चिदानंदमय है ,वह निर्गुण निराकार ब्रह्म हैं ।वह ब्रहांडो की रचना आदि कार्य स्वयं नहीं करते बल्कि उनके अंश ही करते हैं।
टिप्पणियाँ