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श्री राम नारायण मूल परमेश्वर हैं।परम सत्य यह है कि श्री भगवान कभी साकेत का त्याग नहीं करते ,यही श्री हरि अपने एक रूप से गोलोक धाम के नाथ है।
सदाशिव संहिता और शुक संहिता में स्पष्ट तौर पर साकेत लोक का वर्णन किया गया है।
परंतु दुर्भाग्यवश यह किताबें प्रकाशित न हो पाई।उपर्युक्त संहिताओं के अनुसार श्री राम ही तारक ब्रह्म के नाम से जाने जाते हैं।राम रहस्य उपनिषद में श्री हनुमान जी ने विष्णु भक्तों को बताया कि राम ही तारक ब्रह्म हैं,वही परम तत्व हैं तथा राम का तारक मंत्र मुक्ति दाता है। महामना कबीरदास ,तुलसी दास और शिवजी के अनुसार सार नाम राम ही है और राम नाम को जानकर ही मुक्ति होई है।
काशी में श्री शिव जी अपने भक्तों को राम मंत्र देकर ही मोक्ष प्रदान करते हैं। यह कथा अगस्त संहिता ,रामचरित मानस ,रामतापनि उपनिषद तथा कबीर बीजक में भी आयी है।
संत कबीर ने सतलोक को दसवा मुकाम बताया है।इस लोक का वर्णन सदाशिव संहिता में है।निर्गुण राम की महिमा कोई क्या गा सकता है
कारण की उनके रूप ,गुन तथा लीला अनंत हैं।अनंत कोटि ब्रह्मांड तथा अनंत कोटि दिव्य लोक उनके आधीन हैं,उन्हीं का ऐश्वर्य हैं।
पद्म पुराण के उत्तरखंड में श्री शिव ने माता पार्वती को पाद विभूति और त्रिपाद विभूति का विवरण दिया है।सतलोक अर्थात साकेत एवम् गोलोक आदि दिव्य लोक त्रिपाद विभूति में ही स्थित है।पाद विभूति में अनंत कोटि जगत तथा त्रिपाद विभूति में असंख्य दिव्य लोक स्थित है।प्रकृति से उपरी सीमा में विरजा नदी है जो कि त्रिपाद और पाद विभूति में विभाजन करती है।
परमेश्वर के दिव्य लोक (गोलोक,साकेत आदि में )न तो सूर्य ,चंद आदि से प्रकाशित हैं और नहीं बिजली से ,इन्हे प्राप्त करके संसार में कभी लौटना नहीं होता ।इसी से यह मोक्ष ,अमृत तथा सतलोक से जाने जाते हैं।इन्हीं लोको का संकेत श्री भगवान ने गीता में किया है।यह सबके सब लोक एकमात्र कृष्ण के हैं।
वेदों में भी तात्पर्य रूप से उन परमेश्वर का वर्णन है।जैसे कि दिव्य ब्रह्मपुर निवासी।
पूर्ण ब्रह्म का स्वरूप निराकार (मोहतत्व), बेहद, अक्षर से भी परे है । मुण्कोपनिषद् में कहा गया है कि उस अनादि, अविनाशी, कूटस्थ अक्षर ब्रह्म से परे जो चिदघन स्वरूप है, उन्हें ही अक्षरातीत कहते हैं।
अतिशय तेज (असंख्यों सूर्य) से प्रकाशमान, अति मनोहारिणी, यशोरूप तेज से चारों ओर से घिरी हुई, अति तेजस्विनी, किसी से भी न जीती गई उस ब्रह्मपुरी में ब्रह्म प्रवेश किए हुए हैं । (अथर्ववेद १०/२/३३)
आठ चक्रों और नवद्वारों से युक्त, अपने आनन्द स्वरूप वालों की, किसी से युद्ध के द्वारा विजय न की जाने वाली (अयोध्या) पुरी है । उसमें तेज स्वरूप कोश सुख स्वरूप है, जो ज्योति से ढका हुआ है (अथर्ववेद १०/२/३१) । यहाँ आठ चक्रों का तात्पर्य शरीर के आठ चक्रों से अथवा प्रकृति के आठ आवरणों से नहीं है क्योंकि यह तो नाशवान हैं, जबकि इस ब्रह्मपुरी को अमृत स्वरूप कहा गया है ।
यहां नव द्वारों से मतलब परमधाम की नौ प्रकार की भूमि से है।
सृष्टि रचना के पूर्व पूर्ण पुरुष भगवान नारायण ही थे। बे ही समस्त प्राणियों के मोक्ष दाता हैं। बे समस्त शक्तजनो में विशिष्ट हैं।वहीं सर्व शक्तिमान हैं।उन्होंने स्वयं को चार भागों में विभक्त किया,तीन अंशों या भागों से वे
परम धाम वैकुंठ में निवास करते हैं तथा चौथे अंश अनिरुद्ध नामक नारायण से यह सारा संसार रचा गया।।(मुद्गल उपनिषद)
ब्रह्म संहिता में उन्हें समस्त कारणों का कारण स्वीकार किया गया है।
"ईश्वर: परम: कृष्ण: सच्चिदानन्द: विग्रह:,_ _अनादिरादि गोविन्द: सर्व कारण कारणम:|"_ (ब्रह्म संहिता ५.१) __भगवान तो कृष्ण है, जो सच्चिदानन्द (शास्वत,ज्ञान तथा आनन्द के) स्वरुप है | उनका कोई आदि नहीं है , क्योकि वे प्रत्येक वस्तु के आदि है | वे समस्त कारणों के कारण है | ब्रह्मा जी कहते है: जो वेणु बजाने में दक्ष है, खिले कमल की पंखुड़ियों जैसे जिनके नेत्र है, जिनका मस्तिक मोर पंख से आभूषित है, जिनके अंग नीले बादलों जैसे सुन्दर है, जिनकी विशेष शोभा करोड़ों काम देवों को भी लुभाती है, उन आदिपुरुष गोविन्द का मैं भजन करता हूँ । *(ब्रह्म संहिता ५.३०)
वे आगे कहते है: "मै उन आदि भगवान गोविंद की पूजा करता हूँ, जो अपने विविध पूर्ण अंशो से विविध रूपों तथा भगवान राम आदि अवतारों के रूप में प्रकट होते है किन्तु जो भगवान कृष्ण के अपने मूल रूप में स्वयं प्रकट होते है |" *(ब्रह्म संहिता)
रामचरित मानस में गरुण और काकभुशुण्डि जी का संवाद है- एक बार श्री राम के उदर में काकभुशुण्डि प्रवेश कर गए ,वहां उन्होंने अगणित ब्रह्माण्ड देखे तथा वह अनेकों ब्रह्मांडो में सौ -२ वर्ष रहे।यहां श्री सच्चिदानंदघन परमेश्वर राम अगणित ब्रह्मांड पति बताए गए हैं।श्री भगवान के राम नाम का जाप शिवजी करते हैं।
भागवत में कृष्ण साक्षात रूप से परमेश्वर कहे गए हैं एवम् महेश्वर तंत्र में जिन्हें दिव्य ब्रह्मपुर वासी तथा अक्षर ब्रह्म से भी परे बताया गया है।गर्ग संहिता एवम् ब्रह्म वैवर्त पुराण में जो पूर्ण परमेश्वर बताए गए हैं।
ब्रह्म वैवर्त पुराण में श्री कृष्ण से ही तीन गुणों सत्व,रज और तम , महत तत्व, अहंकार,पंचभूत और उनके विषय शब्द,स्पर्श,रूप,रस और गंध की क्रमशः उत्पत्ति हुई।इसके बाद श्री कृष्ण से ही नारायण,शिव जी ,श्री दुर्गा देवी ,महालक्ष्मी ,सरस्वती ,ब्रह्मा , सावित्री आदि की उत्पति हुई।श्री कृष्ण से ही उस महाविराट अक्षर ब्रह्म की उत्पत्ति हुई जिसके रोमकुपों में अनंत ब्रह्मांडो की स्थिति है।जो खेल -2 में अगणित ब्रह्माण्ड बनता है और संहार करता है।
सारी बातों को विस्तार से जानने हेतु ब्रह्म वैवर्त ग्रंथ को ही देखना चाहिए।
इतना सब कुछ होने पर भी हमारे कुछ हिन्दू भाई रामपाल द्वारा बताए कबीर को परमेश्वर मानने लगते हैं।जबकि कबीर बीजक,कबीर ग्रंथावली में उन्होंने सतलोक वासी निर्गुण राम की महिमा गाई है ,वह उनके भक्त हैं।
मेरा उन भटके हुए लोगों को एक संदेश ---------
भाई मेरे ! क्यों आप एक संत को भगवान बनाने पर तुले हुए हो।
कबीर बीजक में उन्होंने निर्गुण राम की महिमा गाई है।वह राम के उपासक हैं
कबीर बीजक पर ,कबीर ग्रंथावली पर ,कोई कुछ नहीं बोलता ,कारण यह है कि इसमें वह परमेश्वर के सच्चे भक्त बताए गए हैं।
भाई लोगों !
एक राम दसरथ का बेटा, एक राम घट घट में बैठा,एक राम का सकल पसारा, एक राम त्रिलोकी से न्यारा,
यह चार प्रकार के राम कबीर साहब ने बताए हैं।
अब जो चौथा राम हैं ,वह सबसे न्यारे हैं कारण की वह सतलोक के वासी निर्गुण राम हैं।
यह सतलोक ही पद्म पुराण आदि में अयोध्या और साकेत कहा गया है।यह लोक अनंत ब्रह्मांडो से परे विरजा नदी से भी अति दूर दिव्य परव्योम में स्थित माना जाता है।
इन्हीं साकेत वासी राम की महिमा कबीर जी ने गाई है।
कबीर ग्रंथावली का प्रमाण देखें -
लूट सके तो लूट ले, राम नाम की लूट ।
पाछे फिरे पछताओगे, प्राण जाहिं जब छूट ॥
कबीर बीजक का प्रमाण देखे
हरि मोर पीव मै राम की बहुरिया।राम मोर बड़ा मै तन की लहुरिया।
यहां कबीर जी राम को अपना पींव तथा खुद को उनकी नारी बताते हैं।
राम गुन न्यारो न्यारो न्यारो।
अवुझा लोग कहांलौं बूझ बूझनहर विचारो।।
केते रामचंद्र तपसीसौ जिन यह जग विटमाया।
केते कन्ह भए मुरलीधर तीन भी अंत न पाया।।
मत्स्य कच्छ वाराह स्वरूपी वामन नाम धराया ।
केते बुद्ध भये निकलंकी तीन भी अंत न पाया।।
केतक सिद्ध साधक सन्यासी जिन वनवास बसाया।
केते मुनि जन गोरख कहिए तीन भी अंत न पाया।।
जाकी गति ब्रह्म नहीं पाई शिव संकादिक हारे।
ताके गुण नर कैसेपैहौ क़है कबीर पुकारे।।
आप सभी कबीर बीजक को जरूर पढ़ें और सत्य ज्ञान को प्राप्त करे ।यह बीजक संत कबीर की गुप्त बानी है अर्थात आसानी से समझ नहीं आती।
बीजक में सार नाम राम को बताया गया है।
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