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गोलोक धाम की उत्पत्ति कैसे हुई?/गोलोक धाम कहां पर है?/गोलोक धाम किसका लोक है?/ गोलोक धाम का वर्णन कीजिए?
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Note- गोलोक त्रिपाद विभूति से व्याप्त है। अरबों - खरबों ब्रह्मांडो को लांघकर तथा विरजा नदी के उस पार गोलोक धाम स्थित है।यह परमेश्वर स्वरूप ही है।
आमतौर पर सबके मन में यह लालसा रहती है कि गोलोक धाम कैसा है? गोलोक धाम कहां पर है?
वह किसका लोक है?
गोलोक को हिन्दू जनता सर्वश्रेष्ठ लोक मानती है।आइए हम गोलोक धाम की उत्पत्ति को समझने का प्रयास करते हैं।गीता में भी श्री कृष्ण ने इसका संकेत किया था। गोलोक को ही परमधाम कहा जाता है।
इसके बाद भगवान शेष की गोद में महान गोलोक धाम प्रकट हुआ।वह अनंत कोटि सूर्यों के समान तेजमयी था।
श्री कृष्ण के चरनों से देवी गंगा तथा उनके बाएं कंधे से नदियों में श्रेष्ठ यमुना जी प्रकट हुई।।श्री भगवान ने रास मंडल तथा निकुंज ,लीला सरोवर आदि की सृष्टि की।निकुंज में कई सरोवर शोभा पा रहे थे ,भांति भांति के पक्षी वहां कलरव कर रहे थे।
दिव्य वृक्ष लगे थे।वहां के भवनों का निर्माण दिव्य रत्नों जैसे मोती, माणिक्य से हुआ था जो कोटि - २ अग्नियो के समान तेजबाले थे। अब भगवान ने अपने दोनों घुटनों से वनो में श्रेष्ठ दिव्य वृंदावन का निर्माण किया।
अंत भगवन श्री कृष्ण के वाए कंधे से एक गौर तेज प्रकट हुआ।
उसी तेज से श्री देवी,भू देवी ,लीला तथा विरजा देवी उत्पन्न हुई
।इस प्रकार परम सत्ता ने गोलोक धाम का निर्माण किया!
श्री कृष्ण के विग्रह से उनके बहुत से पार्षद उत्पन्न हुए ।जैसे नंद,सुनंद आदि। राधा से उनकी कई सखियां उत्पन्न हुई।इस प्रकार बह गोलोक धाम लोगों से भर गया।
बाद में लीलादेवी श्री कृष्ण के साथ दिव्य रास मंडल में विराजित हुई।उनके लिए श्री भगवान ने अपने ह्रदय से गोवर्धन पर्वत को प्रकट किया ।वह उत्पन्न होते ही बड़ने लगा ,जिससे वहां कें गोप गोपी गण बहुत डर गए तब श्री कृष्ण ने उसे बड़ने से रोक दिया।उस पर्वत की ऊचाई करोंडो योजन थी तथा लंबाई- चौड़ाई भी बहुत था। परमेश्वर श्री कृष्ण के इस लोक
का विस्तार कोटि योजन है।यहां न माया का प्रवेश है फिर उसके बाल बच्चे तो जा ही कैसे सकते हैं।।गोलोक में बड़े बड़े सींगो बाली गायों रहती है।गोलोक को ही पारव्योम,सनातन लोक,अमर लोक महावैकुंठ आदि अनेक नामों से जाना जाता है।यहां की जनता बड़े सुख से रहा करती है।
काल की भी यहां को गति नहीं है।गोलोक को सूर्य ,चंद और और अग्नि आदि प्रकाशित नहीं करते,वह लोक तो श्री भगवान के तेज से प्रकाशित है।वह चिन्मय लोक बिना किसी आधार के दिव्य परव्योम में श्री कृष्ण की शक्ति से स्थित है।
यह विरजा नदी के उस पार त्रिपाद विभूति में स्थित माना जाता है।
गर्ग संहिता,पद्म पुराण और ब्रह्म वैवर्त पुराण में विस्तार के साथ इसका वर्णन है।इसके अतिरिक्त महेश्वर तंत्र में ,ब्रह्म संहिता ,तापनि उपनिषद तथा देवी भागवत में इस लोक की चर्चा है।
स्वयं श्री कृष्ण ने गीता में इसी लोक का संकेत किया था।
वेदों में इसी लोक का तात्पर्य रूप से वर्णन आता है।किसी भी पुराण ,उपनिषद आदि में इसकी उत्पत्ति नहीं दी परंतु महात्मा गर्ग ऋषि ने अपने इस ग्रंथ में इसके उत्पन्न होने का वृतांत बताया है।
गोलोक के नीचे 50 करोड़ योजन दूर दक्षिण में वैकुंठ तथा वाम भाग में शिवलोक स्थित हैं।
यहां तो केवल हमें गोलोक धाम की उत्पत्ति बताना थी।
भगवान श्री कृष्ण सच्चिदानंद परमेश्वर हैं,वह एकरस हैं।पूर्ण परमेश्वर केवल वही है।और सभी उनके विस्तार हैं।


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