Featured post

शिव का रहस्य


शिव पुराण,
रूद्र संहिता,
अध्याय 6,7,8,9,10
 पर आधारित लेख
कृपया लेख अच्छा लगे तो फेसबुक वा ट्विटर आदि पर शेयर तथा ब्लॉग पर कॉमेंट अवश्य करे।
धन्यवाद।।







शिव को लेकर सभी लोगों के मन यह  जानने की लालसा रहती ही है कि भगवान शिव की पूजा ज्योतिर्लिंग के रूप में क्यों होती है?

दूसरा प्रश्न यह उठता है  कि  देवी दुर्गा कौन हैं ? क्या माता पार्वती  ही देवी दुर्गा हैं ?  तीसरा प्रश्न यह है कि  देवी शिवा के पति कौन हैं? 
सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह होता है कि भगवान शिव की उत्पत्ति कैसे हुई ? क्या भगवान शिव के कोई   माता - पिता हैं?  शिवलोक कहां पर है ?  शिवलोक कैसा है ?तो आइए हम शिव पुराण की ओर चलते हैं। 

मैं अपने इस लेख में शिव का रहस्य बताने जा रहा हूं, जिसे जानकर आप सभी को बेहद आश्चर्य होगा।।
महाप्रलय के समय सपूर्ण चर अचर जगत नाश को प्राप्त हो गया था,उस समय न सूर्य था,न चंद और न ही तारागण ,ग्रह ,उपग्रह आदि समाप्त हो गए थे।पांच महाभूत ,उनके विषय  तथा अहंकार  ,महत तत्व आदि सबकुछ समाप्त हो गए थे,केबल आकाश ही शेष था,जो तेज से रहित चारो तरफ अंधकार से व्याप्त था।
वेदों में जो सत्य ब्रह्म सुना जाता है ,केवल वही था।इसे योगिजन अपने ह्रदय आकाश में स्थित देखा करते हैं। सत ब्रह्म तक मन ,बानी आदि की पहुंच नहीं है।रूप ,रंग ,स्वाद ,स्पर्श 
उसमे नहीं है। न वह छोटा है और न बड़ा,संकोच और विकास से रहित, वह चिन्मय स्वरूप ,ज्ञान स्वरूप , परम आनंद ,आधार रहित,निराकार,निर्गुण , योगीगम्या , सर्व व्याप्त ,एकमात्र  वही,अनादि एवम् अनंत तत्व है।
वेद भी उसके विषय में "है " केबल इतना ही कहते हैं।।।
यह जो पारब्रह्म है ,उसी ने सृष्टि काल आने पर अपने लिए मूर्ति की कल्पना की ।
तब वह परम सत्ता सदाशिव के रूप में  प्रकट हुई।
इन परमेश्वर में समस्त दिव्य गुन विद्यमान हैं।उन्होंने अकेले रहते हुए अपने विग्रह से एक स्वरूप शक्ति  प्रकट की ,जो उनसे कभी अलग न होने वाली थी।







इस शक्ति की आठ भुजायें थी।
यह देवी उमा के नाम से भी कही जाती हैं ,यह शिव की पराशक्ति अंबा देवी हैं।यही शक्ति प्रकृति ,प्रधान ,गुणवती तथा बुद्धि तत्व की जननी कही जाती है।यही महामाया, त्रिदेव जननी ,पराशक्ति आदि अनेक नामों से जानी जाती है।
शिव और शक्ति ने एक साथ ही अपने रहने हेतु शिवलोक नामक क्षेत्र की रचना की,इस लोक को काशी ,अविमुक्त क्षेत्र तथा आनंद वन भी कहा जाता है।यह  लोक सबसे परे  स्थित है।

फिर उन दोनों ने लीला हेतु एक अन्य पुरुष को प्रकट किया  ,जिसका नाम विष्णु रखा ।
यह विष्णु परम पुरुष,आदि पुरुष आदि कहे जाते हैं।शिव ने श्री विष्णु को स्वांस मार्ग से वेदों का ज्ञान दिया  और फिर वह शक्ति   सहित अंतर्ध्यान हो गए।

अब श्री हरि ने बहुत भारी तपस्या की ,जिससे उनके अंगों से  जलधाराएं निकलने लगी।यह ब्रह्म रूप जल स्पर्श मात्र से पवित्र करने वाला था।इस जल से संपूर्ण सूना आकाश व्याप्त हो गया।





इसके बाद थके हुए परम पुरुष ने  उस जल में शयन किया।
जल में शयन करने के कारण ही उन परम पुरुष को नारायण कहा जाता है।
इसके बाद श्री हरि विष्णु से ही सभी तत्व प्रकट हुए।
प्रकृति से महत तत्व ,महत तत्व से  तीनों गुण तथा फिर गुणों के भेद से   तीन प्रकार के अहंकार की उत्पत्ति हुई।अहंकार से पांच तन्मात्रा(शब्द,स्पर्श,रूप,रस एवम् गंध क्रमशः) ,तथा पांच तन्मात्रा से पांचों भूतों(आकाश,वायु,अग्नि,जल और भूमि ) की उत्पत्ति हुई। 
ज्ञान एवम् कर्म इन्द्रिओं की उत्पत्ति हुई ,कुल मिलाकर 24 तत्व उत्पन्न हुए। इन सब को स्वीकार करके श्री हरि उस जल में शयन कर गए।
शिव और शक्ति ने अब  दाहिने अंग से ब्रह्मा  को प्रकट किया और अपनी  माया से उन्हें नारायण के नाभि कमल में डाल दिया। ब्रह्मा जी को यह ज्ञान न था कि की वह कौन हैं,उनके पिता कौन हैं और उनका क्या कार्य है।यह सब जानने हेतु वह कमल नाल के सहारे नीचे की ओर जल में गए।इस तरह प्रयास करते करते उन्हें बहुत वर्ष व्यतीत हो गये,परंतु उन्हें उनके जन्म स्थान का पता न चला,वह थक गए,तब आकाशवाणी हुई तप करो ,तप करो। फिर वह तप करने लगे,इसके बाद उनके तप से खुश होकर श्री हरि प्रकट हुए। उनमें वार्तालाप हुआ।
वह दिनों एक दूसरे को छोटा मानते हुए विवाद करने लगे,उनमें युद्ध -सा होने लगा तब परमेश्वर ज्योतिर्मय स्तंभ के रूप में प्रकट हुए ।
ज्योति स्तंभ को देखकर दोनो आश्चर्य में पड़ गए ,लड़ना छोड़कर उसके आदि अंत का पता लगाने हेतु विचार करने लगे। वह दोनो यह भी न जाने पाए  कि यह क्या है? किसका तेज है?
श्री ब्रह्मा जी ऊपर की ओर तथा श्री हरि नीचे की ओर बहुत दूर तक गए  परंतु बहुत प्रयास करने पर भी उस स्तंभ के और छोर का पता न लगा सके।तब वह दोनों मध्य स्थान पर आकर उसे चारो और से प्रणाम करने लगे।इस बीच वहां एक ऋषि प्रकट
हुए।श्री हरि ने उनसे जाना की यह महातेज
 के रूप में स्वयं महादेव जी ही है।तब ब्रह्मा वा विस्नु ने उन परमेश्वर की स्तुति की।उससे प्रसन्न होकर सदाशिव अपनी शक्ति के साथ प्रकट हुए।इससे पहले उन्हें प्रणव स्वरूप शब्द ब्रह्म के दर्शन हुए।



श्री हरि वा ब्रह्मा जी ने  शिव  के अवतार हेतु  शिव से प्रार्थना की।तब शिव ने कहा है -" ब्रह्मा जी आपकी भ्रकुटी से मेरा रूद्र रूप प्रकट होगा।उन रूद्र और मुझमें कोई अंतर नहीं है। उन रूद्र और श्री विष्णु में भेद करने वाला वास्तविक शांति नहीं पा सकता।यह रूद्र मेरे पूर्ण रूप हैं तथा मेरे हृदय प्रदेश से प्रकट हैं।इं रूद्र की वेष भूषा ,शक्ति सब मेरे समान ही होंगे।"
श्री विष्णु की शक्ति लक्ष्मी,ब्रह्मा जी की शक्ति सरस्वती तथा मेरे स्वरूप श्री रूद्र की शक्ति कालिका होगी।
श्री विष्णु  जी पालन करेंगे तथा ब्रह्मा जी निर्माण एवम् रूद्र सारे जगत के संहार का कार्यभार संभालेंगे।
इस प्रकार दोनो को समझाकर श्री शिव -शक्ति  अपने परम धाम में चले गए।



श्री ब्रह्मा जी ,विष्णु जी तथा रूद्र में क्रमशः रजोगुण ,सत्व गुण एवम् तमोगुण प्रधान रूप से हैं शेष गुण अल्प रूप से हैं,परंतु शिव का रूप ब्रह्म रूप है ,वह तीनों गुणों से पर हैं ,वही परमेश्वर  परब्रह्म भी हैं।
इस प्रकार से यहां ब्रह्मा  , विष्णु ,रूद्र एवम् महेश्वर से पर श्री सदाशिव जी हैं।शिव रूप सभी रूपो का मूल रूप है।
रूद्र एवम् महेश्वर  रूप ,भेष एवम्  वाहन , आसन  आदि में शिव के ही समान हैं उन्होंने कभी स्वयं को  परमेशर  घोषित करने हेतु अहम न किया।इसलिए परम पुरुष ने उन्हें अपनी समता प्रदान की।
शिव का रूप सकल ओर निस्कल दोनो है ,वह सगुण भी हैं और निर्गुण भी।ऐसे रूप किसी और देवता के नहीं है इसलिए उन परमेश्वर की ज्योतिर्मय लिंग रूप से पूजा होती हैं।यहां लिंग शब्द से तात्पर्य प्रतीक या चिन्ह से है ।
शिव का आनंद कानन क्षेत्र मोक्ष का स्थान है ,जो सबसे परे स्थित है।यह रूप  सत्य ,ज्ञान एवम् अनंत ब्रह्म है।।



नोट - " शिवरात्रि तथा सोमवार आदि भगवान शिव को क्यों प्रिये हैं,इस पर हम फिर कभी चर्चा करेंगे।
कैलाश के नाथ श्री रूद्र समय आने पर ब्रह्मा जी से प्रकट हुए और कुबेर की भक्ति से प्रसन्न होकर उसके  निकट कैलाश पर्वत पर रहने लगे।
भगवान सदाशिव  का त्योहार शिव रात्रि है। श्री रूद्र को सावन मास प्रिय है। एवम् सोमवार उन परमेश्वर का इष्ट वार है।।







टिप्पणियाँ