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आइए हम जानने का प्रयास करते हैं कि आखिर श्री कृष्ण कौन हैं ?

'कृष्ण '  एक ऐसा नाम है जो लगभग सभी सनातनियों के दिल में जगह बनाय हुए है।सारे वैदिक शास्त्र एकमत से श्री कृष्ण के ही गुण गाते हैं,उन्हें सर्वेसर्वा कहते हैं। आदि शंकराचार्य  जैसे  अनेक विद्वानों ने  उन्हें परमेश्वर माना है।






ब्रह्म वैवर्त पुराण तथा श्री भागवत में उन्हें स्वयं भगवान के रूप में स्वीकार किया गया है।इसके अलावा विष्णु पुराण ,ब्रह्म संहिता ,गर्ग संहिता तथा महेश्वर तंत्र में भी वो परम ईश्वर घोषित किए गए हैं।ब्रह्म वैवर्त तथा भागवत ग्रंथों में श्री कृष्ण की संपूर्ण कथा वर्णित हैं।


कुछ लोग श्री कृष्ण को भगवान न मानकर केबल महापुरुष ही मानते हैं।इस तरह लोगों का श्री कृष्ण के प्रति अलग अलग नजरिया देखने में आता है।

महाभारत युद्ध प्रारंभ होने के समय उन्होंने अर्जुन को जो दिव्य ज्ञान दिया,वह गीता ज्ञान के नाम से जाना जाता है।यह भगवान श्री कृष्ण की बानी है,जो संसार में फेमस है।इसमें उन्होंने परमेश्वर प्राप्ति के अनेक मार्ग बताए है जैसे निष्काम कर्म , ,भक्ति मार्ग तथा योग मार्ग।उन्होंने यह ज्ञान सबसे पहले सूर्य देव  विवस्वान को दिया था,सूर्य ने राजा मनु को तथा मनु ने अपने पुत्र इक्ष्वाकु को दिया।यह महाराज इक्ष्वाकु रघुकुल के पूर्वज थे।बाद में समय में परिवर्तन से ज्ञान लुप्त हो गया।इसलिए श्री कृष्ण ने वह ज्ञान अर्जुन को उस समय दिया जब वह युद्ध करना नहीं चाह रहा था।ओर अपने कर्तव्य पालन से दूर भाग रहा था।


सूचना - ऋषि- मुनि  भगवान श्री कृष्ण के बारे में क्या कहते है,यह इतना महत्वपूर्ण नहीं है,जितना कि श्री हरि स्वयं के बारे में अपने भक्तों को बताते हैं। श्री कृष्ण ने श्रीमद्भागवत गीता में  परमेश्वर के बारे में तथा स्वयं के बारे जो ज्ञान दिया है ,उस पर चिंतन मनन करने से यह बात अच्छी तरह से सिद्ध हो जाती है श्री कृष्ण ही परमेश्वर हैं।

 यहां मैंने महत्वूर्ण तथ्य को ही लिखा ।

गीता का सार तो श्री भगवान कृष्ण हैं

ब्रह्म वैवर्त पुराण में उन्होंने नंद बाबा को अपनी विभूति का वर्णन करते समय कहा था - देवताओं में मै श्री कृष्ण हूं ,गोलोक में स्वयं  द्विभुज रूप से राधा के साथ तथा वैकुंठ में श्री विष्णु रूप से लक्ष्मी आदि के  साथ निवास करता हूं,

आदि।


अध्याय 6

30 जो मुझे सर्वत्र देखता है और सब कुछ मुझ में देखता है उसके लिए ना तो मैं कभी अदृश्य होता हूं और ना वह है मेरे लिए अदृश्य होता है।


31 जो योगी मुझे तथा परमात्मा को अभिन्न जानते हुए परमात्मा की भक्ति पूर्वक सेवा करता है वह हर प्रकार से मुझ में सदैव स्थित रहता है।

अध्याय 7

03 कई हजार मनुष्यों में से कोई एक सिद्धि के लिए प्रयासरत होता है और इस तरह सिद्धि प्राप्त करने वालों में से विरला ही कोई एक मुझे वास्तव में जान पाता है।

04 पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि तथा अहंकार आठ प्रकार से विभक्त मेरी अपरा प्रकृतियां हैं।

05 हे महाबाहु अर्जुन! इनके अतिरिक्त मेरी एक अन्य परा शक्ति है जो उन जीवों से युक्त है,जो इस भौतिक अपरा प्रकृति के साधनों का विदोहन कर रहे हैं।

06 सारी प्राणियों का उद्गम इन दोनों शक्तियों में है इस जगत में जो कुछ भी भौतिक तथा आध्यात्मिक है उसकी उत्पत्ति तथा प्रलय मुझे ही जानो।

07 ही धनंजय मुझसे श्रेष्ठ कोई सत्य नहीं है जिस प्रकार मोती धागे में गुथे   रहते हैं,उसी प्रकार सब कुछ मुझ पर ही आश्रित है।


08 हे कुंती पुत्र! मैं जल का स्वाद हूं ,सूर्य तथा चंद का प्रकाश हूं वैदिक मंत्रों में ओंकार हूं, आकाश में ध्वनि हूं तथा मनुष्य में सामर्थ हूं।

09 मैं पृथ्वी की आध्य सुगंध और अग्नि की उष्मा हूं। मैं समस्त जीवो का जीवन तथा तपस्वीयों का तप हूं।

10 यह जान लो कि मैं ही समस्त जीवो का आदि बीज हूं बुद्धिमानों की बुद्धि तथा समस्त तेजस्वी पुरुषों का तेज हूं।

11 तुम जान लो कि मेरी शक्ति द्वारा सारे गुण प्रकट होते हैं चाहे  सत,रज या फिर तमोगुण हो। एक प्रकार से मैं सब कुछ हूं किंतु हूं स्वतंत्र। मै प्रकृति के गुणों के अधीन नहीं हूं अपितु वे मेरे अधीन है।

12 तीनों गुणों के द्वारा मोह ग्रस्त यह सारा संसार मुझे गुनातीत तथा अविनाशी को नहीं जानता।

13 प्रकृति के तीन गुणों बाली इस मेरी देवी शक्ति को पार कर पाना कठिन है किंतु जो मेरी शरणागत हो जाते हैं बे सरलता से से पार कर जाते हैं।

21 मैं प्रत्येक जीव के हृदय में परमात्मा स्वरुप स्थित हूं जैसे ही कोई किसी देवता की पूजा करने की इच्छा करता है मैं उसकी श्रद्धा को स्थिर कर देता हूं जिससे वह  उसी विशेष देवता की भक्ति कर सके।




23 अल्प बुद्धि वाले व्यक्ति देवताओं की पूजा करते हैं और उन्हें प्राप्त होने वाले फल सीमित तथा क्षणिक होते हैं देवों को पूजने वाले देव लोक को जाते हैं परंतु मेरे भक्त अंततः मेरे परमधाम को प्राप्त होते हैं।

25 मैं मूर्खों तथा अल्पज्ञों के लिए कभी प्रकट नहीं हूं। उनके लिए तो मैं अपनी अंतरंग शक्ति द्वारा आच्छादित रहता हूं अतः वे यह नहीं जान पाते कि मैं अजन्मा तथा अविनाशी हूं।


अध्याय 10

 मनुष्य को चाहिए कि परम पुरुष का ध्यान सर्वज्ञ , पुरातन नियंता लघुतम से भी लघुतर, प्रतयेक का पालन करता, समस्त भौतिक बुद्धि से परे अचिंत तथा नित्य पुरुष के रूप में करें। वे सूर्य की भांति तेजवान है और इस भौतिक प्रकृति से पर दिव्य रूप हैं।

14 हे अर्जुन! जो अनन्य भाव से निरंतर मेरा स्मरण करता है उसके लिए मैं सुलभ हूं क्योंकि वह मेरी भक्ति में प्रवृत्त रहता है

15 मुझे प्राप्त कर के महापुरुष जो भक्ति योगी हैं कभी भी दुखों से पूर्ण इस अनित्य जगत में नहीं लौटते क्योंकि उन्हें परम सिद्धि प्राप्त हो चुकी होती है।

16 इस जगत में सर्वोच्च लोक से लेकर निम्नतम सारे लोक दुखों के घर हैं जहां जन्म तथा मरण का चक्कर लगा रहता है किंतु हे कुंती पुत्र! जो मेरे धाम को प्राप्त कर लेता है वह फिर कभी जन्म नहीं लेता।

21जिसे वेदांती आप्रकट तथा अविनाशी बताती हैं जो परम गंतव्य है जिसे प्राप्त कर लेने पर कोई वापस नहीं आता वही मेरा परमधाम हैं।

22 भगवान ,जो सबसे महान हैं अनन्य भक्ति द्वारा ही प्राप्त किए जा सकते हैं यद्यपि वे अपने धाम में विराजमान रहते हैं तो भी बे सर्वव्यापी हैं और उनमें सब कुछ स्थित है।


अध्याय 9

04 यह संपूर्ण जगत मेरे अव्यक्त रूप द्वारा व्याप्त है समस्त जीव मुझ में है किंतु में उनमें नहीं हूं।

05 तथापि मेरे द्वारा उत्पन्न सारी वस्तुएं मुझ में स्थित नहीं रहती जरा मेरे योगेश्वर को देखो यद्यपि में समस्त जीवो का पालक हूं और सर्वत्र व्याप्त हूं लेकिन मैं इस विराट अभिव्यक्ति का अंश नहीं हूं क्योंकि मैं सृष्टि का कारण स्वरूप हूं।

06 जिस प्रकार सर्वत्र प्रवह मान प्रबल वायु सदैव आकाश में स्थित रहती है उसी प्रकार समस्त प्राणियों को मुझ में स्थित जाने।

07 हे कुंती पुत्र! कल्प का अंत होने पर सारे प्राणी मेरी प्रकृति में प्रवेश करते हैं और कल्प के आरंभ होने पर मैं उन्हें अपनी शक्ति से पुनः उत्पन्न करता हूं।

08 संपूर्ण विराट जगत मेरे अधीन है यह मेरी इच्छा से बारंबार स्वता प्रकट होता रहता है और मेरी ही इच्छा से अंत में विनाश होता है। 

अध्याय - 13

 14उनके हाथ, पांव, आंखें ,सिर तथा मुंह और उनके कान सर्वत्र हैं इस प्रकार परमात्मा सभी वस्तुओं में व्याप्त होकर अवस्थित हैं।

15परमात्मा समस्त इंद्रियों के मूल स्रोत हैं फिर भी वे इंद्रियों से रहित हैं ,वे समस्त जीवो के पालनकर्ता होकर भी अनासक्त हैं।बे प्रकृति के गुणों से परे हैं ,फिर भी वे प्रकृति के समस्त गुणों के स्वामी हैं।


16परम सत्य जड़ तथा जंगम समस्त जीवो के बाहर तथा भीतर स्थित है सूक्ष्म होने के कारण बे भौतिक इंद्रियों के द्वारा जानने से परे हैं। यद्यपि वे अत्यंत दूर रहते हैं ,किन्तु हम सबों के निकट भी हैं।


17यद्यपि परमात्मा समस्त जीवो के मध्य विभाजित प्रतीत होता है लेकिन वह कभी भी विभाजित नहीं है ।वह एक रूप में स्थित है यद्यपि वह प्रत्येक जीव का पालन करता है लेकिन यह समझना चाहिए कि वह सभी का संहार करता है और सब को जन्म देता है।

18 वे समस्त प्रकाशमान वस्तुओं के प्रकाश स्रोत हैं। बे भौतिक अंधकार से परे हैं और अगोचर हैं।बे ज्ञान, गेय और ज्ञान के लक्ष्य हैं। वे सबके हृदय में स्थित हैं।


23तो भी इस शरीर में एक अन्य दिव्य भोक्ता है ,जो ईश्वर है, परम स्वामी हैं और साक्षी तथा अनुमति देने वाले के रूप में विद्यमान है और  जो परमात्मा कहलाता है।

25 कुछ लोग परमात्मा को ध्यान के द्वारा अपने भीतर देखते हैं तो दूसरे लोग ज्ञान की अनुशीलन द्वारा और कुछ ऐसे  हैं जो निष्काम कर्म योग द्वारा देखते हैं।

26 ऐसे भी लोग हैं जो यद्यपि आध्यात्मिक ज्ञान से अवगत नहीं होते पर अन्य से परम पुरुष के विषय में सुनकर उनकी पूजा करने लगते हैं ऐसे लोग भी जन्म मृत्यु से पर हो जाते हैं कारण की वह प्रमाणिक पुरुषों से ज्ञान प्राप्त किए होते हैं।

अध्याय 15

01भगवान ने कहा -कहा जाता है कि शाश्वत अश्वत्थ वृक्ष है, जिसकी जडे तो ऊपर की ओर जाती है और शाखाऐ नीचे की ओर तथा पत्तियां वैदिक  हैं ।जो इस‌ वृक्ष को जानत है,वह वेदो का जानने बाला है‌‌ ।


03,04इस वृक्ष के वास्तविक स्वरूप का अनुभव इस जगत मे नही किया जा सकता। कोई भी  समझ नही सकता कि इसका आदि कहां है ,अंत कहां है?लेकिन मनुष्य को चाहिए इस मजबूत मूल वाले वृक्ष को विरक्ति के शस्त्र से काट गिराऐ।तत्पशचात उसे ऐसे स्थान की खोज करना चाहिए,जहां जाकर लौटना न पडे़ जहाँ उस भगवान‌ की शरण ग्रहण कर ली जाती है, जिससे अनादि काल से प्रत्येक वस्तु का सूत्रपात तथा विस्तार होता आता है।


06न तद्भासयते सूर्यो न शशांक न पावक:! यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम‌।।

वह मेरा परमधाम न तो सूर्य या चंद्र के द्वारा प्रकाशित होता है और न अग्नि या ‌से जो लोग वहां पहुंच जाते हैं,वे इस भौतिक जगत में फिर से लौटकर नहीं आते।

07ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:। मन: षष्ठानि इंद्रियानि प्रकृतिस्थानि करषति।


12सूर्य का तेज जो सारे विश्व के‌ अंधकार को दूर करता है ,मुझसे ही निकलता है चंद्रमा तथा अग्नि के तेज भी मुझसे उत्पन्न हैं


13 प्रत्येक लोक में प्रवेश करता हू और मेरी शक्ति से सारे लोक अपनी कक्षा में स्थित रहते हैं। चंद्र वनकर समस्त वनस्पतियों को जीवन रस प्रदान करता हूं।

14अह वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रित:।

प्राणापानसमायुक्त: पचाम्यत्र चतुर्विधम्।।

15मैं प्रत्येक जीव के ह्रदय में असीन हूं और मुझ से ही  स्मृति ,ज्ञान तथा विस्मृति होती है। मैं ही वेदों के द्वारा जानने के योग्य हूं।निस्संदेह मैं वेदान्त का संकलनकर्ता तथा समस्त वेदों का जानने वाला हूं।

16द्वाविमौ पुरूषो लोके क्षरच्श्राक्षर एव च।

क्षर: सर्वाणि भूतानि कूटस्थोअक्षर उच्यते।।

17इन दोनों के अतिरिक्त एक परम पुरूष परमात्मा है ,जो साक्षात अविनाशी भगवान है और जो तीनों लोकों में प्रवेश करके उनका पालन कर रहा है।


18चूंकि मैं क्षर तथा अक्षर दोनों के परे हूं और मैं सर्वश्रेष्ठ हूं ।अतएव मैं इस जगत में तथा वेदों में परम पुरूष के रुप में विख्यात हूं।



अध्याय 18

ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देश्ऽर्जुन तिष्ठति ।

भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया (61)

भावार्थ

हे अर्जुन! परमेश्वर प्रत्येक जीव के हृदय में स्थित हैं और भौतिक शक्ति से निर्मित यन्त्र में सवान की भाँति बैठे समस्त जीवों को अपनी माया से घुमा (भरमा) रहे हैं।

तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत ।

तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् ॥62

भावार्थ

हे भारत! सब प्रकार से उसी की शरण में जाओ। उसकी कृपा से तुम परम शान्ति को तथा परम नित्यधाम को प्राप्त करोगे।

66समस्त प्रकार के धर्मों का परित्याग करो और मेरी शरण में आओ। मैं समस्त पापों से तुम्हारा उद्धार कर दूंगा। डरो मत।





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