- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप
Featured post
- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप
संत कबीर ने रामानंद जी को अपना गुरु माना था।
पुनि कबीर बोल्यो अस वानी।मोहिं म्लेच्छ लियो गुरु जानी।।
रामानंद मंत्र नहीं दैहैं। पै उपाय हम कछु रच लैहैं।।
अस कहि गंगा तीरे आयो।सीढ़ी तर निज वेष छुपायो।।
मज्जन हित रामानंद आये।तेहि अंगुरी निज चरन चपाये।।
रोए उठयो तहां तुरत कबीरा।रामानंद कहयो मति धीरा।।
राम राम कहु रोवे नाहि।गुन्यो कबीर मंत्र सोई काही।।
रामानंद तिलकही धरयो।माल पहिरी मुख राम उचार्यो।।
मात पिता मान्यो बौराना।रामानंदी वचन वखाना।।याकों प्रभु किमि वैकलवायो ।राम कहत सब काज भुलायो।।
रामानंद कबीर वोलायो। ताकी बिच पर्दा वंधवायो।।
कहौ तोको मंत्र कब दीन्हो।कहयो कबीर कौन विधि कीनहौ।।
राम नाम सब शास्त्र सारा।वार तीनि मोहे कियो उचारा।।
रामानंद कबीरको ।गुनि अनन्य हरिदासु।।
परदा टारिसो मिलत भे। द्रगन बहावत आंसु।।
टिप्पणियाँ