Featured post

जानिए श्री कृष्ण ने अर्जुन का घमंड कैसे तोड़ा ?

जय श्री हरि।



भगवान श्री कृष्ण की एक -२ लीला बड़ी ही रोचक और ज्ञानवर्धक है।उन लीलाओं का चिंतन मनन करने से श्री कृष्ण में प्रेम होने लगता है।।जिसके परिणास्वरूप कृष्ण लोक की प्राप्ति होती है।
आइए हम एक महत्वपूर्ण कथा का  अध्ययन  करते हैं।

श्रीमद्भागवत पुराण, दस्बा स्कंध ८९ वा अध्याय।

एक दिन की बात है द्वारिका में किसी ब्राह्मणी के गर्भ से पुत्र पैदा हुआ, परंतु वह पृथ्वी का स्पर्श होते ही उसी समय मर गया। ब्राह्मण अपने मृत बालक को लेकर राजमहल के द्वार पर गया और वही पर उसे रखकर दुखी होकर व्लाप करने लगा।
वह कहने  लगा -इसमें सन्देह नहीं धूर्त, ब्राहमण द्रोही और विषयी राजा के कर्म दोष से मेरे बालक की मृत्यु हुई है,जो राजा हिंसा परायण, दु:शील और अजितेंद्रिय होता है,उसकी प्रजा उसके पाप के कारण दुख पर दुख भोगती है।
इस प्रकार दूसरे ,तीसरे करके उसके 8बालक मर गए ।
जब 9 बें बालक के मरने पर उसकी मृत शरीर को लेकर राज महल के दरवाजे पर गया इस बार वहां श्री कृष्ण के साथ अर्जुन भी बैठे थे वह ब्राह्मण दुखी होकर ब्लाप कर ही रहा था तब अर्जुन ने उसे समझाया ब्राह्मण ! दुखी मत हो जान पड़ता है द्वारका में कोई भी क्षत्रिय नहीं है जो तुम्हारे बालक की रक्षा कर सके,मै अर्जुन आपकी संतान की रक्षा करूंगा और यदि रक्षा ना कर सका तो अपने प्राणों को अग्नि देव के लिए समर्पित कर दूंगा।

ब्राह्मण ने कहा - अर्जुन! यहां भगवान श्री बलराम जी, श्री कृष्ण प्रद्युम्न और अनिरुद्ध आदि बैठे हुए हैं जब वह सभी मेरे बालकों की रक्षा ना कर सके ऐसी स्थिति में भला तुम क्या मेरे बालक की रक्षा करोगे? तुम बड़े मूर्ख लगते हो,  मुझे झूठी दिलासा मत दो।
इस पर अर्जुन ने कहा- ब्राह्मण! मैं बलराम ,कृष्ण अथवा प्रधुम्न  नहीं हूं, मैं अर्जुन हूं । मेरा गांडीव धनुष विश्व विख्यात है। मैंने युद्ध में अपने पराक्रम से महाकाल शंकर को भी संतुष्ट किया है ।
मैं मृत्यु के देवता को पराजित करके आपकी संतान को ला दूंगा आप चिंता ना करें।अर्जुन के ऐसा कहने पर उस भरोसा हो गया।
प्रसव का समय निकट आने पर अर्जुन वहीं थे ,उन्होंने परमेश्वर शंकर को नमस्कार करके दिव्य अस्त्रों से उस पूरे घर को पिंजड़े की तरह बानो से ढक दिया।
बालक उत्पन्न हुआ और वह जोर जोर से रो रहा था अब सभी के देखते - २ वह उस पिंजड़े को तोड़कर अदृश्य हो गया।
पंडित ! अर्जुन की निन्दा करने लगा और उन्हें बुरा भला कहने लगा।
अब अर्जुन तत्काल  अपनी योग बल से यमराज पूरी को गए परंतु वहां उन्हें ब्राह्मण का बालक नहीं मिला तब वह इंद्र ,अग्नि ,वरुण आदि के नगरों में गए, स्वर्ग से ऊपर महरलोक आदि में तथा पृथ्वी से नीचे पातालों में भी गए परंतु कहीं भी उन्हें ब्राह्मण का बालक ना मिला वह उदास हो गए और उनकी प्रतिज्ञा पूरी न हो सकी।अब उन्होंने अग्नि में प्रवेश करने का निश्चय किया।
इतने में ही श्री कृष्ण ने उनसे कहा - अर्जुन! अपने आप का तिरस्कार ना करो, मैं अभी तुम्हें ब्राह्मण की सारे बालक दिखलाय देता हूं। यह सारे लोग जो हमारी निंदा कर रहै हैं वह सभी बाद में हमारी निर्मल कीर्ति का बखान  करेंगे।
श्री कृष्ण और अर्जुन दिव्य रथ पर सवार हुए और उन्होंने पश्चिम दिशा में प्रस्थान किया
उन्होंने
 सात -२ पर्वतों वाले सात द्वीपों को , सात समुद्रों को ओर फिर लोकालोक पर्वत को लांघकर घोर अन्धकार में प्रवेश किया।
वह अंधकार बड़ा घोर था कि उसने चारों दिव्य घोड़े अपना मार्ग भूलकर इधर उधर भटकने लगे उन्हें कुछ सोचता ही ना था।
घोड़ों की यह दशा देखकर श्री कृष्णा नहीं परम तेजोमय अपने सुदर्शन चक्र को रथ की आगे आगे चलने की अनुमति दी।

इस प्रकार सुदर्शन चक्र द्वारा बतलाए मार्ग पर रथ आगे बढ़ ता
गया और फिर वह अंधकार की अंतिम सीमा पर पहुंचा।


उस अंधकार के पार पारावार रहित परम व्यापक ज्योति जगमगा रही थी, उसे देखकर अर्जुन की आंखें चौंधिया गई।
ओर उन्होंने अपने नेत्र बन्द कर लिए। अब भगवान के दिव्य रथ ने दिव्य जल राशि में प्रवेश किया उसमें बड़े-बड़े जोर से लहरें उठ रही थी।वहां एक बड़ा सुंदर महल था,उसमे मणियों के हजारों ख्ंबे चमक -२ कर बड़ा तेज प्रकट कर रहे थे।





उसी महल में भगवान  शेष जी विराजमान थे उनका शरीर अत्यंत भयानक एवं अद्भुत था,उनके हजार सिर थे, प्रत्येक फन पर सुंदर-सुंदर मणियां जगमगा रही थी।श्वेत वर्ण का विग्रह था।उन्हीं भगवान स्वरूप शेष की सुखमय गोद में परम पुरुषोत्तम भगवान बिराजमान थे।

अर्जुन ने देखा कि उनका श्री विग्रह वर्षकालीन मेघ के समान श्यामल है,पीला वस्त्र धारण करें ,सुंदर अष्ट भुजाएं हैं,गले से घुटने तक दिव्य वनमाला शोभायमान है।गले में कौस्तुभ मणि है तथा वक्षस्थल में श्रीवत्स का चिन्ह है।मुझ पर प्रसन्नता खेल रही है।बड़े सुहावने नेत्र हैं।
नंद ,सुनंद आदि पार्षद, चक्र सुदर्शन आदि मूर्तिमान आयुध,श्री ,पुष्टि,कीर्ति और अजा ये चारों शक्तियां , ब्रह्मा आदि देवता सबके सब उन परमेश्वर की सेवा कर रहे हैं।

श्री कृष्ण ने श्री अनंत भगवान को प्रणाम किया ,अर्जुन कुछ भयभीत से हो गए,उन्होंने भी उन्हें प्रणाम किया।

भूमा पुरुष ने गंभीर बानी से मुस्कराते हुए कहा -अर्जुन एवम श्री कृष्णा ! मैंने तुम दोनों को देखने के लिए ही ब्राह्मण के बालक को अपने पास मंगवाय थे।
तुम दोनों ने धर्म की रक्षा के लिए मेरी कलाओं के साथ पृथ्वी पर अवतार ग्रहण किया है । पृथ्वी के दैत्यों  का नाश करके तुम लोग शीघ्र से शीघ्र मेरे पास लौट आओ। तुम दोनों ऋषिवर नर और नारायण हो यद्यपि तुम लोग पूर्ण काम और सर्वश्रेष्ठ हो फिर भी

जगत की स्थिति और लोक संग्रह के लिए धर्म का आचरण करो।
जब श्री अनंत भगवान ने उन्हें इस प्रकार आज्ञा दी तब श्री कृष्ण और अर्जुन ने उसे स्वीकार कर लिया और वह नमस्कार करके ब्राह्मण के सभी बालकों को लेकर जिस रास्ते से आए थे उसी रास्ते से लौट आए। द्वारका में आकर उन्होंने ब्राह्मण के बालकों को लौटा दिया अब ब्राह्मण और सभी लोग उनकी कीर्ति का बखान करने लगे। भगवान के परमधाम बैकुंठ लोक को देखकर अर्जुन के आश्चर्य की कोई सीमा ना रही।
यहां श्री हरि के लोक की कुछ चर्चा हुई।
ऐसे अनेकानेक चरित करने वाले श्री कृष्ण को में प्रणाम करता हूं।



टिप्पणियाँ