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महामाया श्री भुवनेश्वरी देवी के चरण कमलों में मेरा प्रणाम।
जिस तरह से गणेश का लोक,श्री हरि का लोक ,रूद्र भगवान का लोक , ब्रह्मा जी का लोक अंतरिक्ष में स्थित माने जाते हैं,इसी तरह देवी दुर्गा का लोक भी होगा ,सो आइए हम पुराणों में देखते हैं कि देवी
दुर्गा का लोक कौन सा है ? एवम् किस ग्रंथ में इसका वर्णन मिलता है।
इसका उत्तर यह है कि
देवी माता का लोक मणि द्वीप है। जहां पर देवी भक्त मरने के बाद जाते हैं।इस लोक की जानकारी हमें देवी पुराण से प्राप्त होती है,यहां पर इसका विस्तार के साथ वर्णन है,इसलिए देवी धाम पर आधारित मैं एक बहुत ही महत्वपूर्ण लेख लिख रहा हूं
देवी भागवत पुराण,
स्कंध -१२,
अध्याय 9,10,11,12 पर आधारित लेख
ब्रह्मलोक से ऊपर के भाग में जो सर्वलोक सुना गया है वही मणिद्वीप है , जहां भगवती विराजमान रहती हैं।
क्योंकि यह सभी लोकों से श्रेष्ठ है,इसलिए इसे सर्वालोक कहा गया है, पूर्व काल में मूल प्रकृति भगवती जगदंबा ने सबसे प्रारंभ में अपने निवास हेतु स्वेच्छा से इस लोक का निर्माण किया था। यह लोक कैलाश, बैकुंठ एवं गोलोक से भी महान तथा श्रेष्ठ है। तीनों लोकों में उसके समान कोई स्थान नहीं है।
यह मणिद्वीप तीनों जगत का छत्र स्वरूप है तथा संसार के तापों का नाश करने वाला है एवम् सभी ब्रह्मांडो का छाया स्वरूप है।
उस मणि द्वीप के चारों ओर अनेक योजन विस्तार वाला वा उतना ही परिमाण में गहरा अमृत का सागर विद्यमान है।
तथा ध्वजा वाले नाना प्रकार के पोतो से संपन्न है।उस सागर में मत्स्य एवम् शंख आदि हैं ,दिव्य रत्नमय तट हैं।
उस सुधा सागर के चारों ओर तट पर दिव्य रत्न मय वृक्ष हैं।
उसके उत्तर तरफ सात योजन विस्तार वाला एक लौहमय परकोटा है।उस परकोटे में चार प्रवेश द्वार तथा कई द्वारपाल हैं।
यह सैंकड़ों विमानों की घरघराहट से तथा घंटा ध्वनि से पूर्ण रहता है।विमानों में लोग देवी के दर्शन हेतु यहां आते हैं तथा इस परकोटे में उनके गण ,वाहन स्थित रहते हैं।स्थान -२ पर रत्न मय वृक्षों से युक्त कई बगीचे हैं
आगे कांस्य का दूसरा परकोटा है।यहां पर अनेक रत्न मय वृक्ष हैं,जो सभी प्रकार के हैं।नदियां तथा सरोवर परकोटे में हैं, जहां कबूतर ,हंस ,तोता, मैना , आदि पक्षी कलरव करते हैं।
आगे ताम्र का परकोटा ,सीसा का परकोटा ,पीतल का परकोटा
रजत निर्मित परकोटा ,स्वर्ण निर्मित परकोटा ,पुष्पराग निर्मित परकोटा - उपर्युक्त परकोटा एक दूसरे से बड़ते क्रम में हैं।
विशेष बात यह है जिस तत्व से परकोटा है,उसी तत्व से वृक्ष,पक्षी ,सरोवर जल ,मंडप आदि सब कुछ निर्मित हैं।
एवम् प्रत्येक परकोटा एक दूसरे से तेज में कई गुना अधिक तेज वाला है।
मणि द्वीप के पूरब दिशा में ऊंचे -२ शिखरों से युक्त अमरावती पूरी अथवा नगर स्थित है।इसमें देवराज इन्द्र शची देवी के साथ दिव्य आसान पर विराजमान हैं।
अग्नि कोण में अग्नि लोक ,दक्षिण दिशा में यमराज लोक ,यहीं पर यमराज चित्रगुप्त के साथ रहते हैं।
पश्चिम दिशा में वरुण लोक ,बायव्य कोण में वायुलोक ,उत्तर दिशा में यक्ष लोक ,ईशान कोण में महारुद्र लोक स्थित हैं ,जहां ईशान देव अपने दिकपालों के साथ रहते हैं।
पुष्प राग से आगे पद्म राग मणि युक्त प्रकार है ,अनेक गोपुर एवम् द्वारों से युक्त यह लंबाई में दस योजन है ,वहां सैकड़ों मंडप है ,जो पद्म राग मणि से निर्मित हैं।
इस प्रकार के बीच देवी की ६४ कलाएं अपने -२ लोक में रहती हैं।लोकों में कला के साथ प्रजा भी रहती है। पिंगलाक्षी,विशालाक्षी, माया ,सावित्री,स्कन्द माता,प्रकृति आदि उन कलाओं के नाम हैं।
अब आगे गोमेद मणि से निर्मित परकोटा है,३२ महादेवी निवास करती हैं,यहां की निवासियों की प्रत्येक वस्तु अर्थात भवन,पक्षी,
वृक्ष ,सरोवर सभी गोमेद मणि से निर्मित हैं।महादेवियों के अपने -२ लोक हैं।उनके नाम इस प्रकार है - नारायणी,अंबिका,महाकाली,जगदम्बा,कालरात्रि आदि।
गोमेद मणि से आगे हीरे से निर्मित परकोटा है ,यहां भुवनेश्वरी के सेविकाएं रहा करती हैं।
गोमेद मणि से आगे वैदूर्य मणि से निर्मित परकोटा है ।अनेक गॉपुर एवम् द्वारों से शोभा पाता है।यहां ८ मातृ शक्तियां रहती हैं ,उनके नाम माहेश्वरी,कौमारी,ब्राह्मी ,वाराही,इंद्राणी ,चामुंडा,वैष्णवी है।
यहां के भवन , गलियां,कुआ,तट आदि प्रत्येक वस्तु वैदूर मणि से निर्मित है।
अब इससे आंगी इंद्र नीलमणि का परकोटा है जिसमें 16 शक्तियां अपने-अपने लोक में रहा करती हैं इन शक्तियों के नाम इस प्रकार हैं उमा, दुर्गा, सरस्वती, श्री, लक्ष्मी
स्मृति ,मिर्धा, मती आदि। यहां की प्रत्येक वस्तु इंद्र नीलमणि से निर्मित है।
इंद्र नीलमणि से आगे मोती से निर्मित परकोटा है जिसकी भूमि मोती से निर्मित है।यहां एक अष्टदल वाला कमल है जिसकी अष्ट दलों पर एक-२ शक्ति निवास करती है ,यह देवियां भगवती शिवा की मंत्रना करने वाली शक्तियां हैं।दस योजन की ऊंचाई तक विस्तार है।यह प्रत्येक ब्रह्मांड की जानकारी शिवा को देती हैं।
इससे आगे महा मरकत मणि से बना हुआ एक दूसरा परकोटा है,यह दस योजन विस्तार वाला है,यहां की प्रत्येक वस्तु मर्कत मणि से निर्मित है।यहां एक ६ कोण वाला यंत्र हैं जिसके प्रत्येक कोणों पर क्रमशः पूर्व में ब्रह्मा जी तथा सावित्री , नैऋतय कोण पर सावित्री तथा महा विष्णु एवम् उनके अंश विराजमान हैं,
वायु कोण में महा गौरी शंकर अपने रूपों के साथ निवास करते हैं।
अग्नि कोण में कुबेर अपनी शक्ति के साथ रहते हैं तथा पश्चिम के महान वरुण कोण में कामदेव रति के साथ रहते हैं।
ईशान कोण में गणेश अपनी विभूतियों के साथ निवास करते हैं
इससे आगे प्रवाल मणि का परकोटा है यहीं पर पांच भूतों कि शक्तियां रहती हैं तथा भूमि ,भवन अर्थात प्रत्येक वस्तु प्रवाल मणि से निर्मित है।
प्रवाल मणि से निर्मित परकोटे से आगे ९ रत्नों से निर्मित कई योजन विस्तृत एक परकोटा है इसमें देवी के सारे अवतार अपनी आवरण शक्तियों के साथ रहते है।इं देवियों का तेज अनेक(करोड़ों) सूर्यो जैसा है।
इस ९ रत्न मय प्रकार के आगे चिंतामणि से बना हुआ एक विशाल भवन है ,वहां की प्रत्येक वस्तु चिंतामणि तत्व से निर्मित है।उसमे सूर्य,चन्द्र, अग्नि जैसे दीप्ति वाले पदार्थों से निर्मित हजारों स्तंभ हैं।जिससे तीव्र प्रकाश उत्पन्न होता फलस्वरूप कोई भी वस्तु भवन के अंदर दिखाई नहीं देती।
यह भगवती का चिंता मणि जो भवन है ,इसमें हजार स्तम्भ वाले चार मंडप हैं जो इस प्रकार हैं
पहला श्रृंगार मंडप - यहां देवियां गीत गाती रहती हैं।
दूसरा मुक्ति मंडप - यहां श्री देवी भक्तों को मुक्ति प्रदान करती है।
तीसरा ज्ञान मंडप -दिव्य आसन पर स्थित होकर भक्तों को ज्ञान प्रदान करती हैं।
चौथा एकांत मंडप- यहीं पर जगत रक्षा हेतु देवी अपने मंत्रियों से विचार विमर्श करती हैं।
यह मंडप तेज में कोटि कोटि सूर्य के समान है।उन मंडपों के चारों ओर केसर,मल्लिका, कुंद की वाटिकाएं हैं,जिनमें असंख्य गंधमृग शोभा पाते हैं।तथा वहां दिव्य रत्न मय सरोवर हैं।जिनमें भौरें ,हंस हैं।
चिंतामणि भवन में दिव्य मंच पर श्री देवी भुवनेश्वर महादेव के साथ विराजमान होती हैं। (इस मंच के पाए ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र ,ईश्वर हैं । सदाशिव इस मंच के फलक है ।इससे यह मंच दिव्य हो जाता है।)
भुवनेश्वर महादेव १६ वर्ष जैसी अवस्था वाले , करोड़ों सूर्य जैसा प्रकाश करोड़ों चंद्र जैसा शीतल वाला उनका रूप है।उन दोनों की अंग कांति से सारा भवन प्रकाशमान है। करोड़ों कामदेव उनके सामने कुछ भी नहीं हैं।पंचमुख महदेव देखने में बड़े ही मनमोहक लगते हैं।
इसी प्रकार श्री देवी करोड़ों करोड़ों सूर्य एवम् चन्द्र जैसी अंग कांति को धारण करती हैं। भी इच्छा शक्ति ज्ञान शक्ति एवं क्रिया शक्ति से संपन्न है।। लज्जा तुष्टि पुष्टि कीर्ति कांति क्षमा दया बुद्धि मेधा स्मृति एवं लक्ष्मी - ये मूर्टिमती अंगनाएं हैं।
जया विजया अजीता अपराजिता नित्या विलासिनी अघोरा मंगला एवम् दोग्धरी - ये पीठ शक्तियां सदा सेवारत हैं।शंख ,पद्म निधि स्थित हैं।
वे भगवती भुवनेश्वर महादेव के वाम अंक में विराजमान हैं।
यह विशाल भवन हजार योजन विस्तार वाला है।
देवी का यह लोक अंतरिक्ष में विना किसी आधार के स्थित है।इस लोक का
प्रलय काल में संकोच वा सृष्टि काल में विकास होता है।
प्रत्येक ब्रह्मांड में रहने वाले जो देवी भक्त हैं ,वह मणिदीप लोक को प्राप्त होते हैं। घी,दूध, दधी एवम् मधु आदि नदियां हैं ,एवम् अन्य हजारों नदिया हैं।इसके अलावा मनोरथ पूर्ण कर्ता वृक्ष स्थित हैं।
वहां काम, क्रोध, लोभ, मोह, बुढ़ापा, रोग,चिंता आदि कुछ भी नहीं है, वहां की प्रजा बड़े सुख से रहा करती है,सबके सब युवा अवस्थ से संपन्न हैं।देवी की अराधना सभी लोग किया करते हैं तथा हजारों सूर्य जैसा तेज होता है,एवम् योग्यता अनुसार माता अंबा फिर उन्हें मोक्ष दिया करती हैं।
करोड़ों सूर्य ,चन्द्र, अग्नि तथा विद्युत - ये सब इस मणि द्वीप की प्रभा के करोड़वें अंश के करोड़वें अंश बराबर भी नहीं हैं।
वहां कहीं पर मूंगे के समान प्रकाश फैल रहा है ,तो कहीं अन्य रत्न जैसा।श्री देवी का यह धाम स्व प्रकाशित है।एवम् इस लोक का प्रकाश दस हजार योजन तक फैल रहा है।
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