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गर्ग संहिता
वृंदावन खंड ,शिव एवम् आसुरी उपाख्यान नामक २४ तथा २५ अध्याय
श्री कृष्ण की एक प्रिय भक्त एवम् महातपस्वी मुनि थे।जिनका नाम आसुरी था।वे मुनि नारद गिरि पर्वत पर श्री हरि के ध्यान में तत्पर हो तपस्या करते थे।वह अपने ह्रदय में ज्योति मंडल के मध्य राधा कृष्ण का चिंतन करते थे, एक समय रात में जब मुनि ध्यान करने लगे, तब श्री कृष्ण उनके ध्यान में नहीं आए।उन्होंने बारंबार ध्यान लगाया, परंतु उन्हें सफलता नहीं मिली।
इससे वह बहुत दुखी हुए एवम् ध्यान से उठकर बद्री खंड में नारायण आश्रम को गए ,किंतु वहां भी नारायण के दर्शन नहीं हुए। अत्यंत विस्मित हो,वे ब्राह्मण देवता लोकालोक पर्वत पर गए लेकिन वहां सहस्त्र सिर वाले अनंत देवता का उन्हें दर्शन न हुआ। तब उन्होंने वहां के पार्षदों से पूछा कि भगवान यहां से कहां
गए हैं ? उन्होंने उत्तर दिया- हम नहीं जानते!
उनके इस प्रकार उत्तर देने पर उन मुनी को बड़ा दुख हुआ।
फिर वे क्षीरसागर से सुशोभित श्वेत दीप में गए किंतु वहां भी शेष शैय्या पर श्री हरि का उन्हें दर्शन न हुआ।
तब मुनी का चित् और भी खिन्न हो गया।भगवान के पार्षदों से पूछा तो पता चला कि भगवान बताकर नहीं गए की वह कहां जा रहे हैं !उनके इस प्रकार से कहने पर आसुरी मुनि का चित् बहुत दुखी हो गया ,वह कहने लगे -क्या करूं ?,कहां जाऊं ?कैसे श्री हरि के दर्शन होंगे ?
यों कहते हुए मन के समान गतिशील आसुरी मुनि बैकुंठधाम में गए किंतु वहां भी लक्ष्मी के साथ निवास करने वाले भगवान नारायण के दर्शन उन्हें नहीं हुए।
इसके बाद आसुरी मुनि परात्पर धाम गोलोक को गए किन्तु
वहां वृंदावन के निकुंज में श्री हरि के दर्शन न हुए ,फिर तो मुनि श्री हरि के दर्शन वियोग से बहुत व्याकुल हो गए।
उन्होंने कृष्ण पार्षदों से पूछा - भगवान कहां गए हैं ,?तब हरि सेवकों ने कहा - वामन अवतार के ब्रह्मांड में , जहां कभी पृश्निगर्भ अवतार हुआ था,वहां साक्षात भगवान पधारे हैं।
फिर मुनि गोलोक से उस ब्रह्मांड में आए।
श्री हरि के दर्शन न होने से मुनि तीव्र गति से चल कर कैलाश पर्वत पर आए ,वहां गोविन्द के ध्यान में मग्न बैठे हुए शिव से पूछा- भगवन ! मैंने सारा ब्रह्मांड इधर- उधर छान डालो, ईश दर्शन लालसा से वैकुंठ से लेकर गोलोक तक का चक्कर लगा आया,किन्तु कही भी देवाधिदेव का दर्शन मुझे नहीं हुआ।
सर्व शिरोमणि ! बताइए इस समय भगवान कहां है ?
महादेव जी बोले - मुनि ! आप धन्य हो। श्री हरि के निष्काम भक्त हो।महामुने ! मैं जान ता हूं तुमने श्री दर्शन हेतु महान क्लेश उठाया है।
क्षीर सागर में रहने वाले हंस मुनि बड़े संकट में पड़ गए थे,उन्हें बचाने हेतु जो बड़ी उतावली से वहां तक गए थे,वे ही श्री हरि वृंदावन में आकर सखियों के साथ रास क्रीड़ा कर रहे हैं।
मुनि! उन्होंने स्वमाया से ६ महीने बराबर की रात्रि की है।
मै उसी रास उत्सव के दर्शन के लिए वहां जाऊंगा ,तुम्हे चलना है ,तो तुम भी चलो जिससे तुम्हारी लालसा पूरी हो।
इस प्रकार वह दोनों ब्रजमंडल में कृष्ण दर्शन की लिए गए,वहां पहुंचकर यमुना तट पर स्थित ज्यों ही रस मंडल में प्रवेश करने लगे ,त्यों ही गोपियों ने उन्हें वल पूर्वक प्रवेश करने से रोक दिया।वह दोनों गोपियों से बोले - हम कृष्ण दर्शन की लालसा से यहां आए हैं।।
गोपियों ने कहा - कृष्ण आज्ञासे अनेकों गोपियां इस वृंदावन को चारों ओर घेर कर पहरा से रही हैं।यदि आपको गोविंद दर्शन की अभिलाषा है तो तत्काल इस मान सरोवर में स्नान करें,जिससे गोपी स्वरूप की प्राप्ति होगी कारण कि रास मंडल में एकमात्र पुरुष श्री कृष्ण स्थित हैं ,वहां कोई दूसरा पुरुष नहीं जा सकता।
गोपियों कि बात को मानकर आसुरी एवं शिव ने मानसरोवर में स्नान किया एवम् गोपी स्वरूप को प्राप्त कर रास मंडल में प्रवेश किया।
रास मंडल की भूमि दिव्य रत्नमय अर्थात मोती,पद्मराग मयी हो गई थी,वह प्रदेश माधवी लताओं से व्याप्त एवम् कदंब वृक्षों से आच्छादित था,तरह -२ के पक्षी जैसे मोर ,हंस,कोकिल ,चातक वहां मीठी बोली सुना रहे थे।अनेक सभा मंडप एवं रत्न मय खंभे शोभित थे,यमुना जी की सीढियां दिव्य रत्न मय थी।
इस प्रकार से वह सारा प्रदेश दिव्यता को प्राप्त था,एवम् बड़ा ही चित् को भाता था।
वहां निकुंज में राधा कृष्ण कई सखियों से घिरे हुए थे।श्री राधा एवम् कृष्ण का स्वरूप बड़ा ही मनमोहक था।
हाथ में वंशी व बेंत लिए ,श्री विग्रह पर पीताम्बर धारण किए थे,उनके वक्षस्थल पर श्री वत्स का चिन्ह , कौस्तुभमणि तथा वनमाला शोभा पा रहे थे। ऐसे उत्कृष्ट रूप को धारण करने वाले श्री कृष्ण को दूर से ही देखकर उन दोनों ने हाथ जोड़कर समस्त गोपियों के देखते हुए उन परमेश्वर की स्तुति की।
आसुरी एवम् शिव द्वारा कि गई श्री कृष्ण स्तुति
उस स्तुति से प्रसन्न मन हुए श्री मेघ के समान गम्भीर बानी में बोले - तुम दोनों ने ६० हजार वर्षों तक निर्पेक्ष भाव से तप किया है ,इसी से तुम्हे मेरा दर्शन प्राप्त हुआ। जो शांत तथा शत्रु भावना से रहित है वही मेरा शाखा है अतः तुम दोनों अपना अभीष्ट वर मुझ से मांग लो।
शिव और आसुरी बोले -भूमन ! आपको नमस्कार है।
आप दोनों प्रिया एवं प्रीतम के चरण कमलों की सन्निधि में इस वृंदावन के भीतर हमारा निवास हो। आपके चरण कमलों के अलावा हमें और कोई भी वर रुचिता नहीं है। अतः आप दोनों राधा एवं कृष्ण को नमस्कार है।
तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन दोनों की प्रार्थना स्वीकार कर ली एवं तभी से शिव एवम् आसुरी मुनि का वहां नित्य निवास हो गया।
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