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साकेत लोक कैसा है ?/वैकुंठ लोक कहां पर है? /सतलोक कहां है?/ श्री हरि विष्णु कहां रहते हैं?


 आम तौर पर सभी विष्णु भक्तों के मन में यह जानने की लालसा रहती है कि वैकुंठ लोक कहां है ?  साकेत लोक कैसा है?  अयोध्या के राम कैसे थे?



संत कबीर के निर्गुण राम कौन हैं?

सतलोक कहां है? अमर लोक कैसा है ?  विष्णु कहां रहते हैं ?

संत कबीर ने मोक्ष मार्ग के दस मुकाम बताए हैं। दसवां मुकाम ही परम सत्य है अर्थात यही साकेत लोक है।इसी का नाम सतलोक  ,अमर लोक है।

तो आइए हम पद्मपुराण की ओर चलते हैं।

यहां श्री शिव ने माता पार्वती को इस लोक के  बारे में बताया है।


बैकुंठ लोक में साकेत नगरी है इस नगरी को अयोध्या भी कहा जाता है। यह लोक की स्थिति विरजा के अति परे है।श्री कृष्ण अपने प्रेमी भक्तों को वैकुंठ लोक  लेकर गए थे।

महा उपनिषद ,मुद्गल उपनिषद आदि के अनुसार सृष्टि के आदि में श्री हरि ही थे,उस समय केवल वही थे।

  वैकुण्ठ धाम अनेक जनपदो से व्याप्त है।श्री भगवान उसी में  निवास करते हैं।वह रत्नमय विमानों तथा मणिमय महलों से व्याप्त है।उस धाम के मध्य भाग में दिव्य नगरी साकेत है।वह चहारदिवारों  और ऊचे दरवाज़ों  से घिरी है।उनमें  मणियो तथा स्वर्ण  के चित्र बने हैं।उह नगरी में  चार प्रवेश द्वार हैं।चण्ड आदि द्वारपाल,कुमुद आदि दिक्पाल उसके रक्षक हैं।पूर्व  में  चण्ड -प्रचण्ड, दक्षिण  में भद्र- सुभद्र ,पश्चिम में जय- विजय ,उत्तर में धाता और विधाता  द्वार पाल रहते हैं।भगवान के पार्षद गण कुमुद,कुमुदाक्ष,पुण्डरीक,वामन,शण्कुण,सुमुख,आदि।उस पुरी में कोटि- 2अग्नि के समान तेजोमय घरों  की पंक्तियाँ शोभा पाती हैं।उनमें तरूण अवस्था वाले नर नारी निवास करते हैं।पुरी के मध्य भाग में श्रीभगवान का मनोहर अंतःपुर है।उसमे भी अच्छे-2 घर विमान,और  प्रासाद हैं।दिव्य अप्सराए और नारियां सब ओर से उस अन्तःपुर की शोभा बड़ाती हैं।



बीच में एक दिव्य मण्डप है जो राजा का खास स्थान है।उसमे बड़े- 2 उत्सव होते रहते हैं।वह मण्डप रत्न मय है तथा उसमें  मानिक के हजारो  खम्भे लगे हैं।वह दिव्य मोतियों से व्याप्त है तथा साम गान से व्याप्त रहता है।मम्डप के मध्य भाग में  एक रमणीय सिंहासन है जो सर्व वेद स्वरूप और शुभ है।वेदमय धर्म आदि देवता उस सिंहासन  को सदा घेरे रहते हैं।धर्म, ज्ञान,ऐश्वर्य, वैराग्य  तथा  सामवेद  आदि चारो वेद  मूर्ति मान होकर  उस सिंहासन  के चारों ओर खड़े  रहते हैं।शक्ति, आधार शक्ति,चित्शक्ति,सदाशिव  शक्ति,अन्य शक्ति वहाँ उपस्थित  रहती हैं।सिंहासन  के मध्य भाग में अग्नि तत्व, सूर्य तत्व एवं चंद देव निवास करते हैं।कच्छप,शेष,तीनों वेदों के स्वामी,गरूण,छन्द, और सारे मंत्र यह सभी उसमें  पीठरूप धारण करके रहते हैं ।यह दिव्य योगपीठ  कहा जाता है।उसके मध्य भाग मेंं अष्टदल कमल है जो उदय कालीन  सूर्य  के समान  कांतिमान है।उसके बीच  में  सावित्री नाम की कणिका है जिसमे देवताओं  के स्वामी परम पुरूष श्री विष्णु  श्री देवी  के साथ विराजमान हैं।भगवान का श्री विग्रह  नीलकमल  के समान श्याम  तथा कोटि सूर्यों  के समान प्रकाश मय है।वे तरूण कुमार  से जान पड़ते हैं ।सुंदर  चार भुजाओं में  शंख, चक्र, आदि आयुध शोभायमान हो रहे हैं।श्रीकृष्ण  के  विग्रह  पर पीताम्बर  सुशोभित है,वे दिव्य मालाओं को धारण किए  हुए  हैं,उनके बाल घुँघराले हैं, जिनमे पारिजात व मन्दार पुष्प शोभा पाते हैं।गले में  कोटि सूर्यो के समान तेजोमय  कौस्तुभमणि धारण  किए  हुए हैं।आठों दिशाओं में अष्टदल  कमल  के एक-एक  दल पर क्रमशः विमला,उत्कर्षिणी,ज्ञाना,क्रिया,योगा,परा,सत्या,तथा ईशाना यह सभी हाथों  में श्वेत रंग के दिव्य चँवर लेकर श्री भगवान की पटरानिया सेवा करती हैं।उनके दोनो ओर भूदेवी,तथा लीला देवी बिराजमान हैं।इस तरह श्री भगवान त्रिपाद विभूति में श्री देवी के साथ निवास करते हैं।



 श्री हरि के धाम को सूर्य, चंद्र  आदि प्रकाशित नहीं करते। करोड़ो भौतिक संसारो से भी ऊपर व अनन्त दिव्य लोकों  से परे भगवान का साकेत है।        महामाया के द्वारा ही श्रीकृष्ण सदा जगत की  रचना एवं संहार करते हैं।लीला विहारी परमव्योम धाम के रहवासी  दिव्य महापुरुष के श्री चरणों  में  शत शत नमन। राम एव परंतत्वं श्रीरामो ब्रह्म तारकम।।साकेत से श्री भगवान कभी आवे जावै नहीं, विरजा नदी के नीचे अनन्त ब्रह्मांड  हैं तथा इस नदी के दूसरी ओर अनन्त लोक हैं।त्रिपाद विभूति के ही अन्तर्गत ही यह अनन्त लोक हैं।यह सारा ज्ञान  माँ पार्वती से  भगवान  शिव जी ने कहा।।

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