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शिव पुराण,उमा संहिता ,अध्याय - 49
एक समय की बात है देवताओं और असुरों के बीच बड़ा भयंकर युद्ध हुआ,जिसमें देवी के प्रभाव से देवताओं की जीत हो गई।इससे उन्हें अपनी शक्ति का बड़ा घमंड हो गया।वह त्रिलोकी में सर्वत्र प्रचार करने लगे कि हम धन्य है,धन्यवाद के पात्र हैं हमारी शक्ति से डरकर असुर लोग पाताल में घुस गए।
हमारा प्रभाव और साहस महान है जो असुर कुल का नाश करने में समर्थ है।इस तरह जहां -तहां अपनी डींगे हांकने लगे।
उसी समय उनके समक्ष एक महान तेज पुंज प्रकट हुआ,जिसे देखकर सभी देवगण विस्मय में भर गए,वह समझ न सके कि यह किसका तेज पुंज है।वह सभी आपस में पूछने लगे - यह क्या है ? क्या है? तब इंद्र ने देवताओं से कहा तुम लोग जाओ और परीक्षा करके पता लगाओ कि वह कौन है?
तब देवेंद्र ने वायु देवता को भेजा ,वायु देव उस महान तेजपुंज के पास गए।तब तेजपुंज ने वायु देव से पूछा- तुम कौन हो ?
ऐसा सुनकर वायु देव गर्व से बोले - मै वायु देव हूं , संपूर्ण जगत का प्राण हूं मुझ में ही स्थावर जंगम रूप यह सारा जगत ओतप्रोत है। मैं ही समस्त विश्व का संचालन करता हूं। यह बात सुनकर उस महान तेजराशि ने कहा - वायु ! यदि तुम सारे जगत का संचालन करते हो तो यह तिनका रखा हुआ है इसे तुम उड़ा कर दिखाओ। वायु देवता ने अपनी सारी शक्ति लगा ली परंतु वह तिनका हिला तक नहीं, तब तो फिर वायु देवता लज्जित हो गए और वापस देव सभा में लौट आए, यहां उन्होंने सभी देवताओं को सारा वृत्तांत बताया।
अब देवराज इंद्र ने अग्नि देव , वरुण देव आदि को उस तेज राशि के पास बारी - बारी से भेजा परंतु सभी देव उस तिनके का कुछ भी ना बिगाड़ सके।
अर्थात अग्नि देव उस तिनके को जला न पाए ,वरुण देव उसे गीला न कर पाए और सब के सब लज्जित तथा दुखी हो गए।
तब देवराज इंद्र ने उस तेज पुंज के निकट खुद जाने का निश्चय किया।परन्तु इन्द्र को आते देखकर वह तेजो राशि अदृश्य हो गई।इससे इन्द्र को और भी विस्मय हुआ,तब वह मन ही मन उस के शरण में चले गए और बार-बार ' मैं उनकी शरण में हूं' ऐसा कहने लगे।
तब देवी शिवा इंद्र पर कृपा करने के लिए और उनके गर्व को दूर करने के लिए उनके समक्ष चैत्र शुक्ल नवमी को दोपहर में प्रकट हुई।वे तेज पुंज के बीच में स्थित थी।वे अपने चार हाथों में क्रमशः वर ,पाश ,अंकुश ओर अभय धारण किए थी। माया देवी बोली -मैं ही पर ब्रह्म ,परम ज्योति ,प्रणव स्वरूपिणी ,तथा युगल रूपधारिनी हूं
मैं ही सब कुछ हूं। मुझसे भिंन्न कोई पदार्थ नहीं है। मैं निराकार होकर भी साकार हूं, सर्व तत्व स्वरूप हूं।मै नित्य स्वरूपा तथा कार्य कारण रूपी हूं। मैं कभी पुरुष का रूप धारण करती हूं ,तो कभी नारी का रूप धारण कर लेती हूं और कभी दोनों का एक साथ रूप धारण करती हूं।मै सर्वस्वरूप ईश्वरी हूं।
मैं ही ब्रह्मा, विष्णु तथा रुद्र हूं। संपूर्ण विश्व को मोह में डालने वाली महामाया मैं ही हूं। काली, लक्ष्मी तथा सरस्वती यह सब मेरी ही शक्तियां हैं। मेरे ही प्रभाव से तुम लोगों ने युद्ध में विजय पाई है तुम मुझे ना जान कर व्यर्थ में ही स्वयं को सर्वेश्वर मान रहे हो। जैसे सूत्र धार कठपुतली को नचाता है, उसी प्रकार मैं ईश्वरी भी संपूर्ण प्राणियों को नचाती हूं।
मेरे डर से हवा चलती है, अग्नि सब को जलाती है और सभी देवता अपने अपने कार्यों में लगे रहते हैं।
मै हमेशा ही स्वतंत्र रहती हूं कभी देव समुदाय को तो कभी असुरों को युद्ध में विजय दिलाती हूं।
माया से परे जिस अविनाशी धाम का वेद वर्णन करते हैं,वह मेरा ही रूप है।
सगुण और निर्गुण भेद से मेरे दो रूप हैं।सगुण रूप माया सहित हैं ओर निर्गुण रूप माया रहित।देवताओं ऐसा जानकर अभिमान छोड़ो और मुझ सनातनी प्रकृति की शरण लो।
तब इन्द्र ने देवी की भक्ति भाव में भरकर स्तुति की ओर फिर माता जगदम्बा अंतर्ध्यान हो गई।
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