- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप
Featured post
- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप
हमें सबसे पहले यह समझना होगा कि शिव के बारे में हमें जानकारी कहां से प्राप्त होती है तथा शिव हैं कौन ?
शिव चरित्र विस्तार के साथ शिव पुराण , लिंग पुराण में दिया है जबकि अल्प रूप से स्कंध पुराण,भागवत पुराण आदि से प्राप्त होता है।शिवलिंग जो शब्द है वह शिव + लिंग से बना है ।
शिव मतलब कल्याणकारी परमेश्वर एवम् लिंग मतलब प्रतीक या चिन्ह अर्थात शिव का प्रतीक या चिन्ह ।यह अर्थ पुराणों में दिया गया है।
शिव ने अपना परिचय ब्रह्मा एवम् विष्णु के विवाद के बीच स्वयं ज्योति रूप से तथा बाद में अपने मूल रूप से दिया था।
शिव ने कहा - मेरे दो रूप हैं सकल एवं निष्कल, दूसरे किसी के ऐसे रूप नहीं हैं। पहले मैं स्तंभ रूप से प्रकट हुआ और बाद में साक्षात रुप से।
ब्रह्म भाव मेरा निस्कल रूप है और महेश्वर भाव सकल रूप है। मैं ही परब्रह्म परमात्मा हूं, ब्रह्म रूप होने के कारण मैं ईश्वर हूं, जीवो पर अनुग्रह करना मेरा कार्य है। ब्रह्मा और विष्णु! अत्यंत विस्तृत एवं जगत की वृद्धि करने वाला होने से मैं ब्रह्म कहलाता हूं।।
सृष्टि से लेकर अनुग्रह तक यह पांचों कृत्य मेरे ही हैं कारण कि मैं ईश्वर हूं। पहले मैं निराकार स्वरूप का बोध कराने के लिए ज्योतिर्लिंग रूप से प्रकट हुआ तथा बाद में साकार स्वरूप का बोध कराने के लिए मैं साक्षात रूप से प्रकट हुआ।यह मेरा ही प्रतीक या चिन्ह(लिंग) है ,जो मेरे ब्रह्म स्वरूप का बोध कराने वाला है। तुम दोनों निश दिन इसकी पूजा करो यह मेरे ही स्वरूप का बोधक है और इससे मेरी ही प्राप्ति होती है।।इसके बाद शिव ने उन दोनों का दिव्य ज्ञान देकर वह अपने लोक आंनद कानन क्षेत्र को चले गए।
जिन परमेश्वर से सृष्टि,स्थिति ,संहार,तिरोभाव एवम् अनुग्रह होता है जो इस संपूर्ण विश्व में समान रूप से व्यापक हैं।
उन्हीं परमेश्वर का प्रतीक ज्योतिर्लिंग है ,एवम् स्वयं उन्हीं के आदेश से यह पूजन पद्धति आरंभ हुई थी.
अन्य पुराण ब्रह्मवैवर्त के अनुसार -
ब्रह्म खंड का ६ अध्याय इसमें श्री कृष्ण कहते हैं -शिवपूजन का फल यह है की जीव कल्याण को प्राप्त होता है।
जो महादेव महादेव , महादेव का उच्चारण करता है, उसके पीछे मैं नाम श्रवण के लोभ से भयभीत की भांति जाता हूं।जो शिव शब्द का उच्चारण करके अपने प्राणों का त्याग करता है वह मोक्ष को प्राप्त हो जाता है। महादेव पाप हंता एवम् मोक्ष दाता है,इसलिए उन्हें शिव नाम दिया गया है।जिसकी बानी में शिव नाम रहता है,वह पवित्र आत्मा है।।
सनातन काल से उन शिव का पूजन होता आ रहा है।विधर्मियों ने इसे मिटाने के अनेक प्रयास किए, पर वह सफल न हो सके।महमूद गजनवी ने सोमनाथ मंदिर पर कई बार आक्रमण किया ,मन्दिर की सम्पत्ति लूटी एवम् नष्ट करके चला गया था
ऐसे अनेकों प्रमाण भरे पड़े हैं संस्कृति को नष्ट करने के।परंतु स्वयं परमेश्वर की ही तो आराधना कि जाती है ,इस लिए उनकी कृपा से ही यह संस्कृति जीवित रही एवम् विकसित होती रही।
परमेश्वर की ज्योतिर्लिंग पूजा का अपने मनमाने ढंग से व्याख्या करना ,यह गलत है।अरे जब गुलामी के दौर में भी यह पूजन पद्धति नष्ट न हुई ,तो अब कोई क्या करेगा।।
सृष्टि के प्रारंभ में ब्रह्मा ,विष्णु ने शिव का पूजन किया,त्रेतायुग में स्वयं श्री राम ने रामेश्वर कि स्थापना कि एवम् उनसे विजय का आशीर्वाद प्राप्त किया।
द्वापर युग के अंतिम क्षणों में श्री कृष्ण ने शिव पार्वती का पूजन किया एवम् उनसे पुत्र प्राप्ति का वरदान प्राप्त किया ।
इस तरह स्वयं श्री विष्णु एवम् उनके अवतारों द्वारा शिव का ज्योतिलिंग रूप से पूजन होता रहा।।
शिव भक्तो की सूची बहुत लंबी है ,शिवपुराण ,लिंग पुराण आदि में दी है ,यहां तो मैंने यह बताने का प्रयास किया कि उन परमेश्वर का पूजन स्वयं ईश्वर श्री हरि ने समय समय पर किया।
पर प्रश्न तो सचमुच अच्छा था । इसका उत्तर शिव के अलावा समुचित रूप से कौन दे सकता था ?इसलिए जो शिव ने इस प्रश्न का जवाब ब्रह्मा ,विष्णु आदि को दिया था ,वही मैंने लिखा।
टिप्पणियाँ