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ईश्वर को पाने का सबसे उत्तम मार्ग क्या है ?

 ईश्वर को पाने का सबसे उत्तम मार्ग क्या है ?

जय श्री हरि


इस सवाल का उत्तर अत्यंत सरल है , ईश्वर को प्राप्त करने का मार्ग भक्ति है।वैसे ईश्वर को पाने के मार्ग तो अनेक हो सकते हैं जैसे योग के जरिए,निष्काम कर्म , शत्रुता के द्वारा(कंस ,शिशुपाल आदि परमेश्वर को प्राप्त हुए),भक्ति के द्वारा ।

परंतु विद्वानों का मानना है कि इन सबमें भक्ति ही श्रेष्ठ साधन है,जिससे भगवान को पाया जा सकता है।

अब भक्ति क्या है ? इसके उत्तर में देवर्षि नारदजी ने अपने नारद भक्ती सूत्र में बताया है कि परमेश्वर के प्रति परम प्रेम ही भक्ति है।।प्रेम में  नेत्रों से आंसु बहने लगते हैं,मन गदगद हो उठता है , गला अवरुद्ध हो रहा होता है,मुंह से आवाज नहीं आती।

प्रेमी कभी रोने लगता है,तो कभी हसने लगता है।

ध्रुव,प्रहलाद,अम्बरीष,हनुमान  तथा आधुनिक समय में रसखान,तुलसीदास, सूर दास ,रैदास ,कबीरदास ,मीराबाई आदि अनेकों उदाहरण हैं,जिन्होंने ईश्वर की भक्ति करके उन्हें प्राप्त किया।।

प्रहलाद को अनेकों शारीरिक यातनाएं दी गई  जैसे -उन्हें आग में जलाने की कोशिश की गई,सापों से डसवाया गया ,विष दिया गया अर्थात उन्हें मारने के भरसक प्रयास किए गए ,परंतु गोविंद कृपा से उन्हें कुछ न हुआ।वह अपने मन से श्री हरि का ही  जाप व ध्यान करते रहे।

अम्बरीष की रक्षा हेतु स्वयं श्री हरि ने सुदर्शन चक्र नियुक्त कर रखा था।

हनुमत ने अपनी प्रभु भक्ती द्वारा श्रीराम को वशीभूत कर लिया है।आज वह भक्ति के उच्च स्तर पर खड़े हैं,और नारद जी की तरह ही  उपासकों को हरि तक पहुंचने का मार्ग बताते हैं।


नोट - वर्तमान की तरह वर्णन करने का कारण यह है कि वह अमर हैं।

महाभारत ,सभापर्व  - सभी ओर से निराश तो द्रौपदी पहले ही हो चुकी थी , उसे केबल अपने गोविन्द का ही भरोसा था ।

दु:शासन द्रौपदी के वस्त्र खींचने लगा ,तो वह श्री कृष्ण का स्मरण कर उनसे पुकार करने लगी-  हे गोविन्द ! यह द्वारका वासी! गोपीजनवल्लभ ! हे सर्वशक्तिमान प्रभु ! कोरव मुझे अपमानित कर रहे हैं ,क्या आपको यह मालूम नहीं है ?

हे रमानाथ, हे जनार्दन ! मैं कोरवों के समुद्र में डूब रही हूं ,मेरी रक्षा कीजिए।आप सच्चिदानंद स्वरूप महायोगी हैं। हे गोविंद !आप सर्व स्वरूप तथा समस्त जीवो के जीवन दाता हैं ,मेरी इन कौरवों से रक्षा कीजिए।

श्री कृष्ण के स्मरण में तन्मय हो मुंह ढक कर वह रोने लगी ,उसकी आर्त पुकार गोविंद तक पहुंची ,उन परमेश्वर का दिल करुणा से भर आया,भक्तवत्सल प्रभु प्रेमपरवश द्वारका की सेज ,भोजन और लक्ष्मी को भी भूल गए।तत्काल प्रभु दौड़े और द्रौपदी के पास पहुंच गए,उन्होंने द्रौपदी को अनेकों वस्त्रों से ढक दिया। दूसित मानसिकता वाले लोगों के मंसूबों पर परमेश्वर ने पानी फेर दिया।

और द्रौपदी की लाज की रक्षा की।

मार्कंडेय ऋषि की संपूर्ण आयु १६ वर्ष थी ,अंतिम वर्ष में वह शिव का पूजन कर रहे थी,स्वयं यमराज उस बालक के प्राण लेने आए।यमराज ने बहुत जोर लगाया पर रुद्रप्रताप से उस बालक का कुछ न कर पाय,अंत में भक्त रक्षा हेतु खुद परमेश्वर को आना पड़ा ,उन्होंने यमराज को लौटा दिया ,

अपने भक्त को लंबी आयु दी तथा शुभ आशीर्वाद दिए।

महा मृत्युंजय  मंत्र इस प्रकार है - ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्द्धनम्।

उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥


मीराबाई जी को उनके देवर ने विष देकर मारने का प्रयास किया परंतु मीरा तो गोविंद के प्रेम में दीवानी थी।श्री हरि की कृपा से वह जहर भी उनका कुछ नहीं कर पाया।

यह गीत सबके मन को मोह लेता है-

ऐसी लागी लगन, मीरा हो गयी मगन ।

वो तो गली गली हरी गुण गाने लगी ॥

महलों में पली, बन के जोगन चली ।

मीरा रानी दीवानी कहाने लगी ॥

कोई रोके नहीं, कोई टोके नहीं,

मीरा गोविन्द गोपाल गाने लगी ।

बैठी संतो के संग, रंगी मोहन के रंग,

मीरा प्रेमी प्रीतम को मनाने लगी ।

वो तो गली गली हरी गुण गाने लगी ॥

राणा ने विष दिया, मानो अमृत पिया,

मीरा सागर में सरिता समाने लगी ।

दुःख लाखों सहे, मुख से गोविन्द कहे,

मीरा गोविन्द गोपाल गाने लगी ।

वो तो गली गली हरी गुण गाने लगी ॥


अब प्रश्न यह उठता है कि  इनकी परमेश्वर के प्रति भक्ति कैसी थी?भक्ति के तहत क्या क्या करना होता है?

भगवान श्री राम ने माता शबरी को नवधा भक्ति का उपदेश दिया तो आइए सबसे पहले उसी की चर्चा कर लेते है।

नवधा भक्ति- प्रथम संतो का संग ,,दूसरा प्रभु कथा में प्रेम,तीसरा

गर्व रहित होकर गुरु की सेवा, चौथा गुणों का गान ,

पांचवा राम मंत्र का जाप और उनमें विश्वास, 

६  निरमल स्वभाव या चरित्र,  सातवां - सारे संसार को भगवन्मय जानना वा संतो को प्रभु से अधिक समझना,आठवां

संतोश एवम दूसरो के दोष न देखना,

नवीं भक्ति है सरलता और सबके साथ कपटरहित बर्ताव करना, हृदय में भगवान का भरोसा रखना और किसी भी अवस्था में हर्ष और दैन्य (विषाद) का न होना।

विशेष - माता शबरी में यह नवधा भक्ति पूर्ण रूप से  विद्यमान थी ,इसी के फलस्वरूप उन्होंने दुर्लभ गति पाई।श्री राम ने स्वयं के दर्शन का फल जीव के सहज स्वरूप का ज्ञान होना बताया है।।

श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार  नवधा भक्ति -

श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्।अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम्।। अर्थात भगवान की कथा सुनना, नाम कीर्तन, स्मरण, चरण वंदन, सेवा, पूजा, प्रनाम,सखभाव एवम् आत्म समर्पण।

भक्ति का महत्व - इस सन्दर्भ में स्वयं भगवान ने क्या कहा है उसी को देख लेते हैं।

मैं सब भूतों में समभाव से व्यापक हूं, न कोई मेरा अप्रिय है और न कोई प्रिय है परंतु जो भक्त मुझे प्रेम से भजते हैं, वे मुझ में है और मैं भी उनमें प्रत्यक्ष प्रकट हूं।(गीता)

हे अर्जुन! जो पुरुष अनन्य चित् होकर निरंतर मुझ पुरुषोत्तम को स्मरण करता है,उस  नित्य निरंतर मुझसे युक्त हुए योगी के लिए मैं सुलभ हूं।।(गीता ८,१४)

गीता में ही भगवान कहते हैं कि मैं अपने प्रेमी भक्तों का संसार समुद्र से शीघ्र उद्धार कर देता हूं।(गीता १२,७)

केबल अनन्य भक्ति के द्वारा मुझको प्राप्त किया जा सकता है।(११/४८) 



सदैव मेरा चिन्तन करो, मेरे भक्त बनो, मेरी पूजा करो और मुझे नमस्कार करो। इस प्रकार तुम निश्चित रूप से मेरे पास आओगे। मैं तुम्हें वचन देता हूँ, क्योंकि तुम मेरे परमप्रिय मित्र हो।(गीता१८,६५)

मोक्ष प्राप्ति के लिए कर्म योग,ज्ञान योग एवम भक्ति  योग विख्यात हैं परन्तु इनमे भक्ति योग अनायास प्राप्त होने बाला है ,इसलिए भक्ति योग सहज है(देवी पुराण)

भागवत व ब्रह्म वैवर्त पुराण में दुर्वासा एवम् राजर्षी अम्बरीष की कथा प्रसंग में श्री भगवान एवम् दुर्वासा जी का संबाद -

मैं सर्वथा भक्तों के अधीन हूं, मुझ में तनिक भी स्वतंत्रता नहीं है

मेरे भोले भक्तों ने मेरे हृदय को अपने बस में कर रखा है।भक्तजन मुझसे प्यार करते हैं और मैं उनसे।

अपने भक्तों का एकमात्र आश्रय मैं ही हूं उन्हें छोड़कर मैं ना तो अपने आपको चाहता हूं और ना विनाश रहे लक्ष्मी को।

जो भक्त अपने पुत्र, पत्नी ,घर, स्वार्थ, इस लोक तथा पर लोक 

आदि सब कुछ छोड़ कर मेरी शरण में आ गए फिर भला मैं उन्हें छोड़ने का संकल्प भी कैसे कर सकता हूं।

मेरे भक्त  मुझे छोड़कर कुछ भी नहीं चाहते ,विशेषकर

मोक्ष भी नहीं ।।


यही बात उन्होंने ऊधव से कहीं - हे ऊ धव ! मुझे तुम्हारे जैसे प्रेमी भक्त जितने प्रियतम हैं,उतने प्रिय न तो पुत्र ब्रह्मा ,आत्मा शंकर ,सगे भाई बलराम जी,मेरी पत्नी लक्ष्मी और यहां तक कि मेरी अपनी आत्मा भी नहीं।

शिव पुराण में शैवों की लिए मोक्ष के तीन साधन बताए गए हैं- महेश्वर का श्रवण,कीर्तन एवम् मनन ।यह तीनों मुक्ति के साधन स्वयं नंदी को श्री भगवान ने बताए। फिर नंदी ने सनतकुमार को ,सनत कुमार ने व्यास जी को एवम् उन्होंने सूत आदि अपने शिष्यों को इनका ज्ञान कराया।



श्रवण -कान से श्री भगवान के नाम,गुण एवम् उनकी लीलाओं का श्रवण करना।

कीर्तन - वानी द्वारा उनकी लीलाओं का ,गुणों एवम् नामों का गान करना।

मनन - मन से उनकी  लीलाओं का ,उनके रूप का निरंतर चिंतन करना ही मनन कहलाता है।


जो यह सब न कर सके उसके लिए शिव की लिंग वा मूर्ति पूजा करना बताया गया है।लिंग पूजा शिव के निराकार रूप का प्रतीक है।।

हम चाहे शिव का पूजन करें या फिर शक्ति अथवा श्री हरि का ,स्वरूतः इनमे कोई अंतर नहीं।

परमेश्वर से प्रेम होना चाहिए।प्रेम से ही ईश्वर प्राप्ति होती है।





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