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कालिका अवतार - शिव पुराण ,उमा संहिता
जब सारा जगत एकर्णव के जल में निमग्न था,उस समय श्री विष्णु शेष शैय्या पर योग निद्रा में लेटे हुए थे,तब उनके कानों के मल से दो असुर मधु एवम् कैटभ उत्पन्न हुए,बे दोनों श्री हरि के नाभि कमल से उत्पन्न ब्रह्मा जी को मार डालने के लिए तत्पर हो गए।उन दोनों से भयभीत होकर ब्रह्मा जी ने श्री हरि को जगाने का बहुत प्रयास किया ,उनकी स्तुति की तब भी उनकी नींद न खुल सकी।इससे ब्रह्मा जी इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि श्री हरि स्वतंत्र परमेश्वर नहीं है ,अपितु वह योग निद्रा के अर्थात महामाया के अधीन हैं,तब तो वह उस योगनिद्रा की स्तुति करने लगे।ब्रह्मा जी ने कहा - हे देवी ! दोनों असुरों को मोहित करो एवम् भगवान नारायण को जगा दो।
ब्रह्मा जी के इस प्रकार कहने पर महामाया
फाल्गुन शुक्ल द्वादशी को
श्री विष्णु के नेत्र आदि अंगों से निकलकर ब्रह्मा जी के सामने खड़ी हो गई।एवं देवी ने ब्रह्मा जी से कहा- डरो मत , मैं तुम्हारे सारे कष्टों का निवारण करुगी।
इसके बाद श्री हरि जाग गए,तब उन दोनों से बहुत लंबे समय तक श्री हरि का युद्ध चला ,अंत में देवी ने उन्हें मोहित कर दिया ,इससे वह श्री हरि से वोले -तुम हमसे कोई वर ग्रहण करो।
श्री हरि ने कहा - यदि तुम दोनों मुझसे प्रसन्न हो तो मेरे हाथ से मारे जाओ,वह दोनों ठगे से रह गए।
उन्होंने कुछ सोचकर कहा - हे विष्णु ! आप हमें उस स्थान पर मारें , जहां जल से भीगी धरती न हो।
तब तो श्री हरी ने अपने जांघ क्षेत्र पर उन दोनों का सिर सुदर्शन चक्र द्वारा धड़ से अलग कर दिया।
यह महाकाली की उत्पत्ति का वृतांत है,जो शिव पुराण ,दुर्गा सप्तशती ,देवी पुराण के अनुसार है।
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