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Who was mahishasur ?
महालक्ष्मी अवतार -
देवी उमा के महालक्ष्मी अवतार की यह कथा शिव पुराण,देवी पुराण,दुर्गा सप्तशती के अनुसार है।
महिषासुर कौन था ? एवम् महिषासुर को मारने वाली देवी कौन थीं ?
उत्तर -
रंभ नाम से प्रसिद्ध एक असुर था,उससे महिष दानव का जन्म हुआ ,उसने ब्रह्मा जी के वर प्रभाव से देवताओं को युद्ध में जीत लिया एव स्वर्ग में रहकर संपूर्ण जगत का शासन करने लगा।
इस तरह शासन करते हुए उसे बहुत समय निकल गया ,तब देवता बहुत दुखी होकर ब्रह्मा जी के पास आए।ब्रह्मा जी उन समस्त देवताओं को लेकर उस स्थान पर गए, जहां शिवजी एवम् विष्णु जी उपस्थित थे।
वहां पहुंचकर उन्होंने महादेव वा श्री हरि को अपना दुख सुनाते हुए कहने लगे -"मैं महिषासुर ने युद्ध में हम सब देवताओं को जीत कर स्वर्ग लोक से बाहर निकाल दिया है। इसलिए हम मृत्यु लोक में भटक रहे हैं, हमें कहीं भी शांति नहीं मिल रही है।
उस असुर ने इंद्र आदि देवताओं की क्या क्या दुर्दशा नहीं की है
सूर्य चंद्र वरुण कुबेर यम इंद्र अग्नि वायु गंधर्व तथा चारण - इन सबके तथा अन्य देवताओं के जो भी कर्तव्य कर्म है, उन सबको वह स्वयं ही करता है। उसने असुर पक्ष को अभय- दान कर दिया है। इसलिए हम सब देवता आप की शरण में आए हैं। आप दोनों हमारी रक्षा करें और उस असुर के वध का उपाय स्वयं सोचें , क्योंकि आप दोनों ऐसा करने में समर्थ हैं।
देवताओं की बात सुनकर वह दोनों बहुत क्रोधित हो गए।
क्रोध करने पर उनके मुख तथा अन्य देवताओं के शरीर से तेज प्रकट हुए,वह सब तेज आपस मिलकर एक नारी के रूप में परिणत हुए।
देवी का मुख शिव तेज से ,भुजाएं विष्णु तेज से ,केश यम तेज, से,स्तन चन्द्र तेज से, कटी भाग इन्द्र तेज से ,जांघ एवम् उरू क्षेत्र वरुण तेज से उत्पन्न हुए, धरती के तेज से नितम्ब,ब्रह्मा के तेज से चरण उत्पन्न हुए आदि
अर्थात सभी देवताओं के तेज से श्री देवी का विग्रह निर्मित हुआ।सभी देवों ने उन्हें अपने -२ हथियार दिए।शिव ने त्रिशूल ,विष्णु ने चक्र तथा ब्रह्मा ने कमंडल एवम् क्षीर सागर ने वस्त्र भेंट किए।हिमवान ने सवारी हेतु सिंह दिया,यम ने काल दंड ,प्रजापति ने अक्ष माला दी।
कुल मिलाकर जिस देवता के पास जो देने योग्य था,वह देवी को अर्पित किया।
फिर देवी ने उच्च स्वर से गरजना कि,उस नाद को सुनकर सारी त्रिलोकी में हलचल मच गई।देवता एवम् देवियां उन जगदम्बा की जय - जयकार करने लगे।
यह आवाज महिषासुर तक पहुंची,फिर वह सेना के साथ युद्ध क्षेत्र में आया ,उसके सेनापति एक एक कर आए एवम् देवी के हाथों मौत को प्राप्त कर गए।उनमें मुख्य नाम इस प्रकार से हैं जैसे चिक्षुर,चामर,कराल ,वाष्कल,ताम्र , विडाल,अंधक,दुर्मुख आदि।अंत में देवी का महिषासुर के साथ भयानक युद्ध हुआ
,जिसे देखकर देवता भयभीत होने लगे,वह धूर्त कपट युद्ध करने पर उतारू हो गया तब देवी बोली - र मूर्ख ! तेरी बुद्धि मारी गई है,तू व्यर्थ हट करता है।तीनों लोक में कोई भी मेरे सामने ठहर नहीं सकता।
यों कहकर देवी ने अपने पैर से दबाकर उसके कंठ में शूल में प्रहार किया,वह दूसरे रूप से बाहर निकल ही रहा था कि देवी ने उसे अपने प्रभाव से रोक दिया एवम् तलवार से उसका सिर धड से अलग कर दिया।बची हुई सेना भयभीत होकर पताल लोक को लौट गई।
देवी माता की इस जीत से स्वर्गमे दुंदुभी बजने लगी, देवता नाचने तथा गाने लगे,चारों ओर देवी की जय जयकार की जाने लगी।देवता बहुत खुश हो गए,उनके सारे मनोरथ देवी ने पूरी कर दिए।
समस्त देवताओं ने देवी की आरती उतारी ,इसके बाद देवी स्वधाम को चली गई।
इस तरह से यह महालक्ष्मी का अवतार पूर्ण हुआ।
विशेष - देवी भागवत में यह कथा बहुत विस्तार से दी गई।
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