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दुर्गम असुर का वध किसने किया था ?

 Who was mother durga ?

दुर्गम असुर कौन था ? दुर्गम असुर का वध किसने किया था ?

शाकंभरी देवी किसका नाम है ?

रुरू  नामक

 असुर का पुत्र दुर्गम महा बलवान था ,उसने ब्रह्मा जी से वर पाकर चारों वेदों को अपने हाथों में ले लिया तथा देवताओं के लिए अजेय वल पाकर उसने धरती पर इसे कार्य किए जिससे स्वर्ग में देवता भी थर्रा उठे। वेदों के उस दुष्ट असुर के हाथ में जाने पर सारे संसार में वैदिक क्रिया नष्ट हो गई।

सारे लोग भ्रष्ट हो गए ,न यज्ञ होता ,न तप किया जाता था एवम् न ही होम वा दान आदि किया जाता परिणाम स्वरूप धरती पर १०० साल के लिए वर्षा बंद हो गई।
तीनों लोगों में हाहाकार मच गया, सब लोग दुखी हो गए, सबको भूख प्यास का महान कष्ट सताने लगा। कुआ तालाब नदियां एवं समुद्र आदि सूख गए। समस्त वृक्ष एवं लताएं सूख गई।इससे लोग भूंखों मरने लगे फलस्वरूप समस्त देवता योग माया की शरण में गए ।
देवताओं ने कहा - समस्त प्रजा की रक्षा करो रक्षा करो। हे देवी अपने क्रोध को रोको नहीं तो सब प्राणी नष्ट हो जाएंगे। हे माता ! जिस प्रकार से तुमने मधु - कैटभ , महिषासुर , चंड मुंड शुंभ निशुंभ आदि दैत्यों का वध किया है उसी प्रकार इस असुर का नाश करो। बालकों पर पल पल पर अपराध होता ही रहता है, केवल माता के अलावा ऐसा कोन है जो उस अपराध को सहन कर सके।
तुमने बार-बार हमारी रक्षा की है, हम आप की शरण में हैं, आप हमारी रक्षा करें।
तब देवी का ह्रदय करुणा से भर आया और उन्होंने अनंत नेत्रों से युक्त अपने रूप के दर्शन कराए, उनका मुखारविंद प्रसंता से खिला हुआ था

और वे अपने चारों हाथों में क्रमशः धनुष, बाण, कमल नाना प्रकार के फल मूल आदि लिए थीं।
प्रजा को कष्ट उठाते देख उनके आंसु निकल आए ,वह ९ दिन  एवम् ९ रात तक रोटी रहीं।उनके नेत्रों से हजारों जल धाराएं निकलने लगी ,जिससे नदी ,सरोवर एवम् सागर सभी पानी से भर गए।वृक्ष ,साग,ओषधियां  आदि पुनः अंकुरित हो गए।
स्वयं भागवत महा पुरुषों को अपने हाथ से फल देने लगी।
गायों के लिए सुंदर घांस ,अन्य प्राणियों के लिए भोजन की व्यवस्था की।
देवताओं ने देवी से कहा - आप वेदों को उस दुष्ट से छुड़ाकर हम लौटा दीजिए एवम् इस असुर का वध कर डालिए ।
तब देवी ने तथास्तु कहा 

फिर तो देवी ने उस असुर को युद्ध हेतु ललकारा देवी एवम् दैत्य के बीच भयंकर युद्ध हुआ।उस असुर की बहुत बड़ी सेना थी।
तब देवी ने अपने कई रूप बनाकर उन असुरों से युद्ध किया।
काली, तारा, भुवनेश्वरी, भैरवी, बगुला, मातंगी एवं त्रिपुर सुंदरी आदि देवियों ने असुर सेना को नष्ट के डाला।
स्वयं भगवती शिवा का उस दुर्गम के साथ युद्ध हुआ।
अंत में देवी ने उस दैत्य को अपने त्रिशूल से मर डाला ।बची हुई सेना पाताल में घुस गई।
सारी त्रिलोकी में आंनद छा गया ,ढोल नगाड़े बजने लगे।
सब देवता आंनद ने भरकर देवी माता की स्तुति करने लगे।
देवता वोले - हे देवी ! आपने हमारे लिए कई नेत्रों से युक्त रूप धारण किया था इसलिए लोग आपको शताक्षी नाम से पुकारेंगे।
 आपने शाकों द्वारा समस्त प्रजा का भरण पोषण किया है इसलिए आपका नाम शाकंभरी होगा। देवी ! दुर्गा मां सुर का वध करने के कारण आप दुर्गा नाम से प्रसिद्ध होंगी।
सूर्य चंद्रमा  आपके नेत्र हैं, आप तक मनवाणी की पहुंच नहीं है आप ही परम पुरुष परमेश्वर हैं, हम आप की महिमा नहीं जानते। आप देवी को बार-बार नमस्कार करते हैं।
श्री देवी बोली - हे देवताओं ! 
देसी गाय अपने बच्चों को देखकर दौड़ी चली आती है उसी प्रकार में आप लोगों को कष्ट में देखकर दौड़ी चली आती हूं। तुम्हें ना देखने से मेरा एक क्षण भी बड़े कष्ट से व्यतीत होता है।
मैं तुम्हें अपने बच्चों के समान समझती हूं, तुम लोगों को कष्ट में नहीं देख सकती।
आगे भी जब तुम पर कष्ट आएंगे,मै उनका निवारण करूंगी।मै यशोदा के गर्भ से उत्पन्न होऊंगी, इससे लोग मुझे नंद की पुत्री कहेंगे ,
भविष्य में शुंभ निशुंभ जो दूसरे असुर उत्पन्न होंगे,उन्हें नष्ट कर डालूंगी।।इसी तरह भ्रमर  का रूप धारण कर अरुण नामक असुर का वध करूंगी ,इस कारण लोग मुझे भ्रामरी कहा करेंगे।

भीम रूप धरकर  असुरों को नष्ट करूंगी ,तब मुझे लोग  भीमदेवी के नाम से पुकरेंगे। इतना कहकर 
 देवी माता अपने लोक को चली गईं।

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