- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप
Featured post
- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप
शिष्य अपने गुरुदेव से पूछता है - भगवन! आपने बैकुंठ एवं नारायण दोनों को ही नित्य बतलाया है साथ ही उन दोनों को तुरीय तत्व भी कहा है।
बैकुंठ लोक एवं भगवान नारायण दोनों ही साकार हैं परंतु तुरीय तत्व निराकार होता है।
श्रुति में कहा गया है कि जो साकार है,वह अवश्य नाश को प्राप्त होता है एवम् जो निराकार है ,वह नित्य होता है,इसके साथ ही साकार अवयव सहित है परंतु निराकार अवयव रहित है।
सो आपकी बात मैं नहीं समझ पाया कि आपने बैकुंठ धाम एवम् नारायण को नित्य कैसे बताया।
इस पर गुरुदेव कहते हैं - आप जो कहते हो ठीक है,
परंतु साकार तत्व दो प्रकार का होता है-एक उपाधि सहित साकार तथा दूसरा उपाधि रहित साकार।
अब उपाधि सहित जो साकार है उसकी स्थिति निचले पाद में ही होती है,यहां यहां अनंत ब्रह्मांड एवं उस में विद्यमान वस्तुएं तथा जीव सभी उपाधि सहित साकार हैं और जो विनाश को प्राप्त होते हैं।
उपाधि रहित , जो साकार है वह तीन प्रकार का होता है
१. विद्या उपाधि रहित साकार,२.आंनद उपाधि रहित साकार ,३.तुरीय उपाधि हीन साकार
यह तीनों भी दो- २ प्रकार के होते हैं
१.नित्य साकार - इस प्रकार के को साकार हैं, इनका ना कोई प्रारंभ है ,न मध्य तथा अंत भी नहीं। यह विग्रह परमेश्वर स्वरूप होते हैं, आनंद एवं अखंड रसमय में होते हैं।
२.मुक्त साकार -इस प्रकार के विग्रह वाले जीव उपासना करके मुक्ति पद को प्राप्त हुए होते हैं। इनका यह विग्रह ज्ञान स्वरूप होता है एवं इन्हें विग्रह स्वयं परिपूर्णतम परमेश्वर देते हैं।
आगे गुरु से शिष्य फिर पूछता है कि - भगवन ! नारायण से इस आविद्या अंड की उत्पत्ति कैसे हुई।
इस पर गुरुदेव कहते हैं की भगवान त्रिपाद विभूति नारायण के
पलक उठाने एवम् गिराने से एविद्या पाद में अनेकों ब्रह्मांड की उत्पत्ति , स्थिति एवं लय हो जाते हैं। जब कभी भगवान नारायण अपनी इच्छा से पलक उठाते हैं तो उनके निचले पाद में प्रकृति का प्राकट्य हो जाता है,प्रकृति से जीव व्यक्त होता है, प्रकृति से ही महत् तत्व एवं इससे अहंकार की उत्पत्ति होती है अहंकार से ५ तन्मात्रा एवम् उनसे पांच तत्व उत्पन्न हुए
यहां शब्द ,स्पर्श,रूप ,रस गंध तन्मात्रा हैं एवम् पांच तत्व अर्थात आकाश ,वायु,अग्नि,जल तथा धरती।
फिर इंद्रिय अधिष्ठाता देवताओं की उत्पत्ति हुई,ज्ञान एवम् कर्म इंद्रियों की उत्पत्ति हुई
इन सभी तत्वों ने मिलकर श्री हरि की सहायता से विशाल ब्रह्मांड की सृष्टि की।
फिर इस ब्रह्मांड में वही आंनद पाद के मध्य में स्थित श्री नारायण प्रकट होते हैं।
श्री नारायण से ही स्थूल शरीर रूप विराट पुरुष की उत्पत्ति हुई
उस विराट पुरुष के एक -२ रोमकूप छिद्र से अगणित ब्रह्मांड उत्पन्न होते हैं।यह विराट पुरुष परमेश्वर का विलास विग्रह है ,इसके अनंत सिर , अनंत मुख एवम् अनंत पैर आदि हैं,यह संपूर्ण ब्रह्मांडो को व्याप्त कर स्थित है। जो पुरुष इन परमेश्वर की भक्ति करता है,वह अंधकार से पार मुक्ति लोक को प्राप्त होता है।
इसके बाद उन आंनद पाद के मध्य स्थित श्री नारायण का प्रत्येक ब्रह्मांड में एक -२ अवतार होता है।
नारायण की नाभि का मंत्र श्री ब्रह्मा जी उत्पन्न होते हैं, नारायण से ही क्षीरसागर वासी विष्णु उत्पन्न होते हैं, भगवान नारायण से रूद्र उत्पन्न होते हैं। नारायण से इंद्र उत्पन्न होते हैं।
नारायण से सभी तत्व उत्पन्न होते हैं।
एकमात्र भगवान नारायण ही निर्विकल्प, निरंजन ,शुद्ध, मुफ्त सगुण ,निर्गुण एवं अखंड ,परिपूर्ण प्रभु हैं, जो इस प्रकार से जानता है वह मोक्ष लाभ करता है।
यहां यह दूसरा अध्याय समाप्त किया जाता है।
ब्रह्मा ,विष्णु एवम् महेश आदि की उम्र क्या है ?
ब्रह्मांड की उत्पत्ति कैसे हुई ?
त्रिपाद विभूति नारायण नित्य हैं या नहीं ।
टिप्पणियाँ