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संसार रचना के समय प्रभु ने लोकों के निर्माण की कामना से एक पुरुष रूप धारण किया,इस पुरुष में दश इन्द्रियां ,एक मन और पांच भूत थे अर्थात 16 कलाओं से यह पुरुष संपन्न था।
फिर इस पुरुष ने जल में शयन करते समय अपने नाभि सरोबर से कमल को प्रकट किया और इस कमल से प्रजापति ब्रह्मा जी प्रकट हुए।
इसी पुरुष को अनंत भगवान एवम् श्री नारायण कहा जाता है।
श्री नारायण के हजारों नेत्र, हजारों कान एवम् हजारों पैर आदि संपूर्ण संसार में व्याप्त हैं ।
इन परमेश्वर को ही विराट पुरुष कहा जाता है।
सर्वप्रथम प्रभु ने सनक , सनन्दन, सनातन, सनतकुमर - इं चार ब्रह्मा पुत्रों के रूप अवतार धारण किया एवम् अखंड ब्रह्मचर्य का पालन किया।
दूसरी बार श्री हरि ने सूकर रूप धारण कर हिरण्याक्ष का वध किया एवम् रसातल से धरती का उद्धार किया।
तीसरी बार देवर्षि नारदजी के रूप में अवतार लिया एवम् पांचरात्र तत्व का ज्ञान दिया।
चौथी बार धर्म पत्नी मूर्ति के गर्भ से नर नारायण के रूप प्रकट हुए एवम् कठोर तपस्या की।
पांचवी बार महामना कपिल के रूप में माता देवहूति व प्रजापति कर्दम ऋषि के यहां प्रकट हुए एवम् आसुरी मुनि को सांख्य दर्शन का उपदेश किया।
अपने 6 वें अवतार में वह दत्रतेया के रूप से अनसूया के यहां प्रकट हुए एवम् अलार्क,प्रहलाद को तत्व ज्ञान का उपदेश किए।
इन्हीं परमेश्वर ने 24 गुरु किए थे।
7 वें अवतार यज्ञ पुरुष के रूप में ग्रहण किए इस अवतार में उन प्रभु के माता पिता क्रमश: पिता रुचि प्रजापति व माता आकूति थी।
८ वा अवतार राजा नाभि एवम् मरू देवी के यहां लिया इस समय उनका नाम ऋषभदेव था।
9 वें अवतार में ऋषियों की प्रार्थना से प्राथू के रूप में प्रकट हुए एवम् धरती से औषधियों का दुग्ध रूप से दोहन किया।
मन्वंतर के लास्ट समय में जब तीनों लोक जल में डूब रहे थे सो मत्स्य के रूप में प्रकट हुए एवम् वैवस्वत मनु की रक्षा की।
यह श्री हरि का दसवां अवतार था।
कच्छप ,धन्वंतरि एवम् मोहिनी अवतार सर्व विदित है जो कि प्रभु ने समद्र मंथन के समय ग्रहण किए थे एवम् देवताओं को अमर बनाया था।
14 वे अवतार में नृसिंह रूप से प्रकट होकर प्रहलाद के प्राणों की रक्षा की। एवम् देव शत्रु हिरण्यकश्यप का वध करके देवताओं को उनका राज्य सौंप दिया।
15 वें अवतार में वामन के रूप से प्रकट होकर राजा बली से तीन पग भूमि दान में मांगकर दो पग से सारी त्रिलोकी को नाप लिया था।
16 वं अवतार परशुराम के रूप में लेकर संपूर्ण धरती को 21 वर क्षत्रियों से मुक्त कर दिया था।
17 वीं वर व्यास के रूप में पाराशर द्वारा सत्यवती के गर्भ से प्रकट होकर एक वेद रूप वृक्ष की अनेकों शाखाओं बना डालीं।
18 वीं बार राजा राम के रूप में प्रकट होकर कई वीरता पूर्ण कार्य किए एवम् रावण को मारकर देवताओं ,ऋषि मुनियों आदि को भय मुक्ति किया।
19वें एवम् 20 वें अवतार में क्रमशः बलराम व कृष्ण रूप से प्रकट होकर अगणित कार्य किए धरती पर धर्म की स्थापना की।
देवकी तथा वसुदेव इस अवतार में माता पिता थे।
श्री कृष्ण ,भगवान विष्णु के पूर्ण अवतार भागवत में बताए गए हैं।
21 वें बार मगध देश में अजन के पुत्र रूप से प्रकट हुए एवम् वह बुद्ध के नाम से प्रसिद्ध हुए।
22 वें अवतार में वह भविष्य अर्थात कलीयुग के अंतिम चरण में विष्णुयश ब्राह्मण के यहां प्रकट होकर दुष्टों का नाश करेंगे,धर्म की स्थापना करके अंतर्ध्यान हो जाएंगे।
अन्य अवतार हंस एवम् हयग्रीव के थे।
सनक ,सनातन आदि को ब्रह्म ज्ञान देने हेतु प्रभु ने हंस अवतार लिया था
हयग्रीव देवी की शक्ति से श्री ब्रह्म जी से वेदों को छीन ले गया था अतः उसे नाश करने हेतु प्रभु ने हयग्रीव अवतार लिया था।
हयग्रीव भगवान का सिर घोड़े का था एवम् शेष धड़ मनुष्य जैसा था।
वैसे तो उन नारायण के अनंत अवतार होते हैं परंतु मुख्य रूप से इन्हीं 24 अवतारों की महिमा गाई जाती रही है।
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