Featured post

श्री रामचन्द्र जी के सतलोक का वर्णन

 नमस्कार  दोस्तों !



आज हम आपको वो रहस्य बताने जा रहे हैं ,जिसकी चर्चा शायद ही किसी पुराण में की गई हो ,मुझे तो ऐसा नहीं लगता।

वेदों में इस परम रहस्यमय क्षेत्र का संकेत रूप से उल्लेख हैं।

संहिता ग्रंथों में हमें श्री रामचन्द्र जी के साकेत लोक का वर्णन मिलता है जैसे शिव संहिता ,शुक्र संहिता एवम् हनुमद संहिता और वशिष्ट संहिता आदि।

कबीर बीजक खेमराज पब्लिकेशन  -इस पवित्र पुस्तक में दिए ज्ञान से साकेत लोक की बहुत कुछ जानकारी हमें प्राप्त हो जाती है।

तो आइए हम शिव संहिता अनुसार साकेत लोक तक पुहुंचने का मार्ग तथा साकेत के बारे में  समझने का प्रयास करते हैं।

धरती से ऊपर महर्लोक ( एक कोटि कोश ), महर्लोके से ऊपर जनलोक (दो कोटि कोश), जनलोक से ऊपर तपलोक (चार कोटि ),तपलोक से ऊपर सतलोक (८कोटि कोश),सत्यलोक से ऊपर १६ कोटि कोश प्रमाण से कुमार लोक है,इससे ऊपर उमालोक  तथा उमा लोक से भी ऊपर शिवलोक है,यह प्रकृति से मिला हुआ है।

इससे ऊपर सात आवरण हैं  पचास कोटि योजन करके दस - २ गुना करके

क्रमशः धरती ,जल ,अग्नि ,वायु एवम् आकाश , रज, तम एवम् सत्व गुण ,त्रिविध अहंकार तथा फिर मूल प्रकृति,यहां तक सात आवरण हैं।

ब्रह्मांड का प्रमाण यही तक है।

इससे ऊपर श्रीमान विष्णु देव का दिव्य वैकुंठ लोक हैं,जो निराधार है। मोती ,माणिक्य से निर्मित भवन  वहां शोभित हो रहे हैं।स्वर्ण निर्मित कोटे चारों तरफ स्थित हैं।यहां की प्रजा बड़े सुख से रहा करती है।

दिव्य कल्प वृक्ष महलों के बाहर हैं । वहां वैकुंठ में अनंत योजन लंबी तथा अनंत योजन चौड़ी गंगा नदी है, जहां संपूर्ण संसार के स्वामी महाविष्णु भगवान सोते हैं ,


जिनके हजारों सिर ,हजारों नेत्र और हजारों पैर आदि हैं ,जिनके निमेष मात्र से संपूर्ण संसार नाश होते हैं और उत्पन्न होते रहते हैं।

जिन महाविष्णु से कई व्रह्मा ,विष्णु एवम् शंकर आदि प्रकट होते व लीन होते रहते हैं,वही परमधाम सर्व प्रथम है।


जिसके ऊपर परमदिव्य ,ज्योति रूप ,निराधार सत्य लोक स्थित है जहां पर संन्यासियों, हरि भक्तों के स्थान हैं।


यहां पर भगवान महाशिव सर्व शक्तियों से युक्त हो आंनद करते हैं। अर्थात यहां सतलोक में महाशिव का स्थान है ,जहां पर वह शक्ति सहित रहत हैं।


इससे भी ऊपर  दिव्य परम कान्तिमय महा वैकुंठ लोक स्थित है ,जिसमें वासुदेव ,संकर्षण आदि विहार करते हैं।

महाविष्णु  श्री राम चन्द्र जी के  दिव्य गुण है,वासुदेव उनके घनी ऐश्वर्य हैं और शरीस के तेज महा शंभु भगवान हैं।


महा वैकुंठलोक से भी ऊपर  माया से परे गोलोक धाम है जो स्वत: प्रकाशित तथा मन ,वचन एवम् इंद्रियों से परे है।

श्री गोलोक धाम सनातन ज्योति रूप है।

गोलोक के मध्य परम दिव्य साकेत पुरी है जो कि मणियों से रचित व दिव्य स्त्री रत्नों से सेवित है।उस नगरी के बीच में श्रेष्ठ वर को देने वाला एक कल्पवृक्ष है।

उस कल्प वृक्ष के नीचे उत्तम दिव्य रत्नों से निर्मित मंडप है 

जिसमें स्वर्ण रचित वेदिका है , उस वेदिका के बीच में परम उज्जवल रतन सिंहासन है ,जिस पर हजार दल वाला एक एक कमल है वह अग्नि ,चन्द्र एवम् सूर्य मंडल से  परिपूर्ण है।

कोटि चंद्र के समान छत्र  एवम् चामार से शोभित है ,जिससे अमृत  समान मेघ बरसते हैं और मुक्ता के झालर से युक्त चांदनी से शोभित है।


उस सिंहासन के बीच में सर्व शक्तियों से नमस्कृत श्री जानकी देवी हैं, वहीं पर सर्व देवों के शिरोमणि श्री रामचंद्र जी विराजित हैं।

श्याम विग्रह श्री राघव परम शांत हैं ,सुंदर दो भुजाएं हैं ,गले में दिव्य कौस्तुभ मणि धारण किए ,एवम् विग्रह पीताम्बर शोभित है।

लक्ष्मण जी चामर लिए पश्चिम में तथा वाएं दक्षिण में भरत व शत्रुघ्न भी दिव्य पंखा लिए श्री भगवान के सेवा में है।राम जी के

सामने  श्री हनुमान जी पुस्तक वाचन करते हुए हैं

इस प्रकार से यह साकेत वासी प्रभु का ध्यान है।


शिव संहिता पंचम पटल का अध्याय २० में साकेत नगर के अन्य नाम दिए हैं ,जो इस प्रकार से हैं- 


अयोध्या,नंदिनी, सत्या,साकेत ,कौशल,ब्रह्मपुर , अपराजिता

 इस नगरी में आठ चक्र व नौ दरवाजे हैं।यह अयोध्या नगरी परम दिव्य ,मुक्ति क्षेत्र ,रसमय क्षेत्र है।

वशिष्ट संहिता के अनुसार 

अयोध्या नगरी नित्य सच्चिदानंद स्वरूपिणी जिसके अंशंश से ही वैकुंठ ,गोलोक आदि धाम प्रतिष्ठित हैं।

श्री राम जी साकेत छोड़कर कभी नहीं जाते,साकेत में ही बने रहते हैं।

शुक संहिता - प्रथम अध्याय ,द्वितीय चरण

वहुलाश्व राजा ने शुकदेव जी पूछा - हे भगवन! गोलोक धाम करके परम स्थान क्या है? जहां परीक्षित राजा रहत हैं।

शुकदेव जी राजा जनक को कहते हैं - 

 पूर्वकाल में मैंने ब्रह्मलोक में ब्रह्मवादियों के मध्य यही सुना की  श्री राम ही सबके दुखहर्ता हरि भगवान हैं,ऐसा सबके मुख से बार -२ सुना फिर तिसके पीछे श्वेतद्वीप अधिपति श्री अनिरुद्ध के पास ब्रह्म प्रसंग की वार्ता में सुना कि राम परब्रह्म ही सबके ध्यान करने योग्य ईश्वर हैं,ऐसा बार - २ सुना।

इसके बाद शेष जी के मुख से सतसंग में राम ही की कथा सुनी की राम ही पारब्रह्म  परमेश्वर हैं ,राम से परे कोई नहीं है।

ऐसा  मैंने स्वयं भी संपूर्ण शास्त्रों को मथकर ग्रहण किया तथा हृदय में उन्हें स्थापित किया ,जीवन सर्वस्य राम ही हैं।




शुकदेव जी आगे बताते हैं कि हे राजन ! कभी गोलोक के मध्य मैं अपनी इच्छा से गया

 तो देखा की हजारों कामधेनु गाए जहां यहां घूम रही हैं,सभी वृक्ष कल्प वृक्ष के समान हैं , जहां साक्षात भगवान कृष्ण चन्द्र के वन वृंदावन शोभित हैं। जहां दिव्य धातुओं तथा लताओं ,कंदराओं  से भरा हुआ गोवर्धन पर्वत है। जहां कालिंदी नदी प्रवाहित हो रही है।

श्री कृष्ण जी लीला रत हैं ,वहां हजारों व्रज स्त्रीगण आंनद मग्न हैं। कई गोप ,गोपियां वहां आंनद से रहा करते हैं।

नन्द जी , यशोदा जी आदि सभी सुख से रहते हैं।

वहां कोई नहीं मरता कारण की वहां काल तथा माया आदि की गति है ही नहीं। नित्य उत्साह ,नित्य  रास ,नित्य सुख उदय होते हैं।


जहां अलौकिक सूर्य कमलों को प्रफुल्लित कर रहे हैं  ,चन्द्र भी जहां कुमुदनी के रस ले रहे हैं।वहां मैंने कालिंदी में स्नान  कर देखा कि  

वंशीवट के मूल में श्री कृष्ण चन्द्र एवम् गोपियों के समूह प्रकाश करते देखा,तहां अनेकों ब्रह्मा आदि कई जन्मों के पुण्य के फलस्वरूप  गोपिभाव को प्राप्त कर विहार करते हैं।

वहीं पर मैंने परीक्षित जी को देखा ,उन्होंने मुझे पूर्व भागवत करने वाला जानकर मुझे प्रणाम किया  

और मुझसे कहा - हे गुरुदेव ! आपके कृपा से भागवत को श्रावण किया ,जिसके फलस्वरूप माया तथा काल से पर  गोलोक को प्राप्त हुआ।

भगवान ! एक सन्देह है,सो आपसे कहता हूं।

कभी वृंदावन में क्रीड़ा मग्न श्री कृष्ण चन्द्र जी को देखकर कोई एक श्याम विग्रह पुरुष अपनी प्रिया के साथ आए जो तेज , बल ,बुद्धि आदि सभी गुणों में श्री नन्द नन्दन के ही समान थे।

उन्हें देखकर श्री कृष्ण जी ने उन्हें नमस्कार किया और राधा सहित उनमें प्रवेश कर गए।


अर्थात उन पुरुष में श्री कृष्ण लीन हुए ओर उन शक्ति में राधा देवी लीन हो गई। फिर उन परमेश्वर ने मुरली धारण कर दिव्य क्रीड़ा की ,जिसे देखकर सभी गोपियां आदि आश्चर्य में पड़ गए।

सो भगवान ! वह पुरुष और उनकी प्रिया कौन हैं , उन पुरुष में श्री हरि क्यों प्रवेश किए यह मेरी समझ में न आया।

तब मैने उन परीक्षित के बोध हेतु उनसे कहा -  हे परीक्षित यह परम रहस्य है ,तुम इसे ध्यान देकर सुनो।

यह चरित श्री राम का परम ऐश्वर्य को सूचित करने वाला है।

न तो वह पुरुषोत्तम है और न ही कोई पुरुष है।

वह तो श्री राम पर ब्रह्म सनातन  हैं।

कभी चित्रकूट पर्वत में  क्रीड़ा करते हुए श्री भगवान को देखकर श्री जानकी जी परम प्रभु से बोली - हे प्रिय! अब आप मृग के शिकार से निवृत्त हो जाइए कारण की पसीने के बूंदों से आपका चेहरा शोभित हो रहा है।

सूर्य भी अत्यन्त तप रहे हैं

अत: इस काल में कुंजलता में बैठिए।

इतना कहकर प्रिया और प्रियतम रूप दिव्य माधुर्य मय कुंज में प्रवेश कर गए।दिव्य कुंज के अंतर्गत अशोकवन में वह घूमने लगे।

तब जानकी जी प्रभु श्री राम से बोली - हे प्रिय!

इस दिव्य कुंज में हमने कभी राधा कृष्ण जैसा विहार नहीं किया।अत : हम विहार करें।

जानकी जी से श्री राम कहने लगे - देवी !

तुम्हारा ही अंश वह वृषभानु दुलारी राधा है और हमारा अंश  श्री नंद नन्दन श्री कृष्ण हैं ,इतना कहकर उन्हैं वहीं उन्होंने दिव्य वृंदावन दिखावत भये। वृंदावन में क्रीड़ा रत  राधा कृष्ण  को देखकर आकर्षण कर वृंदावन सहित वहीं बुला

लियो ,राधा कृष्ण आई गए। तब वह नमस्कार पूर्वक राधा देवी जानकी में तथा कृष्ण ,श्री राम में लीन हो गए।

तव वृंदावन में श्री राम चन्द्र जी ने दिव्य रास लीला की जिसे देखकर सारे देवता व सखी गण मोहित हो गई।

उस रास में अनेक ब्रह्मा ,विष्णु और महेश आदि अपनी प्रियाओं  सहित प्रकट हुए ,तब सब देवता गोपी भाव को प्राप्त हो अपनी -२ प्रिया सहित वहां दिव्य वृंदावन में नृत्य करने लगे।

इस प्रकार कई रात्रियों अर्थात ६ मास की रात्रि  तक यह लीला होती रही।


जब विहार कर चुके तब राधा कृष्ण उनसे निकस कर वृंदावन समेत गोलोक चले गए।

सो शुक देव जी कहते हैं - हे राजन ! यह दिव्य गोलोक धाम श्री राम चन्द्र ने निर्माण किया।

सो ध्यान से सुनो ! 

किस प्रकार से गोलोक निर्माण किया गया।



कल्प के आदि में भगवान श्री राम ने अपनी इच्छा मात्र से तीनों लोक अपने शरीर से उत्पन्न किए 

तहां प्रथम जल को प्रकट कर उसमे दिव्य वैष्णवी तेज ( वीर्य ) छोड़ दिया 

वह दिव्य तेज उस जल में कोटि सूर्य प्रकाश वाला एवम्  स्वर्ण  जैसी कांतीवाला एक विशाल गोलाकार अंड हो गया।

उस अंड में से सर्व लोकों को रचने वाले भगवान हिरण्यगर्भ ब्रह्मा जी के रूप में प्रकट हुए।

उसी से सब चराचर पैदा हुए,उसी में चैतन्य स्थापित कर कोटि - २ ब्रह्मांड रचना किया।

फिर श्री ब्रह्मा जी ने  धरती  को रचा ,उस पर दिव्य सुमेरु आदि पर्वत रचे ,इन्द्र आदि देवों के रहने हेतु स्वर्ग आदि रचना की इस प्रकार से ब्रह्मा जी ने संपूर्ण संसार की रचना की,जिसे देखकर श्री जानकी जी राम जी बोली - 

हे  देव ! आपने श्री ब्रह्मा जी से संपूर्ण संसार का निर्माण करवाया अर्थात ब्रह्मांड में सातों पाताल ,धरती और सातों स्वर्ग  आदि की रचना करवाई।

परंतु हमारा स्थान तो प्रलय में भी कभी नाश को प्राप्त नहीं होता,जो तीनों लोकों  में साकेत नाम से प्रसिद्ध है।

यह तीनों लोक प्रलय में नष्ट हो जाते हैं परन्तु साकेत का कभी भी नाश नहीं होता कारण की अविनाशी है।

हे प्रभु आप पुराने स्थान में विहार करते हैं सो मैं आपसे प्रार्थना करती हूं कि कोई नवीन स्थान बनाइए जो अयोध्या की तरह हो।

सो परम प्रभु ने प्रमोद वन से वृंदावन, कल्प वृक्ष के  अंश से वंशीवट  ,यमुना से विरजा नदी एवम् मणि पर्वत से गोवर्धन पर्वत   अर्थात साकेत लोक के अंश से गोलोक को निर्माण करत भए ,जिसे देखकर श्री जानकी जी बहुत प्रसन्न हुई और प्रभु को साधुवाद देत भई। 

अब जानकी जी राधा  रूप ओर श्री राम कृष्ण रूप होकर नवीन स्थान पर विहार करत भये।

सो जब विहार कर चुके ,सो  जानकी से राधा रूप ओर श्री राम से  कृष्ण रूप वृंदावन में स्थित हुए और जानकी सहित श्री राम जी अयोध्या स्थित हुए।

सो हे राजन !इससे श्री राम ही पूर्ण ब्रह्म हैं,वही नन्द नन्दन श्री गोविन्द हैं।

सदाशिव संहिता अनुसार

साकेत लोक में चार द्वार हैं जिसमें पश्चिम द्वार पर वृंदावन है , जहां विभीषण जी द्वारपाल हैं ,पूर्व में सुग्रीव जी रक्षा करते हैं,उत्तर में बाली पुत्र अंगद जी रक्षा करते हैं तथा दक्षिण द्वार में श्री हनुमान जी रक्षा करते हैं।दसों अवतार अर्थात राम ,कृष्ण ,नृसिंह ,वामन आदि वहां प्रभु सेवा में हैं।



पद्म पुराण के उत्तर खंड के अध्याय २ २८ में  लिखा है कि 

सबसे परे लोक वैकुंठ है , जहां श्री कृष्ण रहते हैं,वहां गोप गोपी तथा कामधेनु आदि बड़ी संख्या में रहत हैं,हजारों की संख्या में रत्न मय दिव्य मंदिर हैं ,विमान आदि शोभित हैं ,

उसी वैकुंठ के मध्य में परम दिव्य अयोध्या नगरी है।

और वैकुंठ के दसों दिशाओं में वासुदेव आदि के लोक हैं।

वह वैकुंठ सात आवरण से युक्त है।




वशिष्ट संहिता अध्याय २६ 


सबसे ऊपर वैकुंठ लोक है,वैकुंठ से भी परे गोलोक है ,गोलोक के मध्य साकेत लोक है 

साकेत के पूर्व में जनक पुर है ,दक्षिण में चित्रकूट ,पश्चिम में वृंदावन है,जहां श्री कृष्ण रहते हैं।

उत्तर में महा वैकुंठ लोक है ,जहां श्री मान नारायण देव रहते हैं ,जो २४ अवतारों के मूल कारण हैं . यही नारायण श्री राम चरित के मुख्य आचार्य हैं।

साकेत में सात आवरण हैं जिनमें २५ अवतार अपने क्षेत्रों में रहते हैं।


विशेष सूचना - यह जो परम गुप्त पुस्तक हैं,जैसे शिव संहिता , हनमद संहिता , वेद सार उपनिषद , शुक् संहिता आदि में ज्ञान 



(सतलोक कैसा है ?

सतलोक कहां है ?

सतलोक में कौन रहता है? 

साकेत  किसका लोक है ?

अयोध्या नगरी में श्री राम रहते हैं ।

Who is aadi ram ?

What is satlok ? 

Where is satlok in space ?

Where is lord ram live  in space ?

Kabeer sahab ka lok satlok kaha hai ?

Kabeer beejak ka sar kya  hai ?

Where is saket lok of lord ram ?)


 









टिप्पणियाँ