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त्रिपाद विभूति नारायण की महिमा भाग -०१

 एक बार ब्रह्मा जी ने परम सत्य जानने की इच्छा से हजारों वर्षों तक तप किया परिणाम स्वरूप महाविष्णु उनकी तपस्या से खुश होकर,उनके सामने प्रकट हुए। 

तब ब्रह्मा जी ने कहा - भगवान ! आप मुझे परम तत्व का रहस्य बताइए।

आप ही इस दिव्य रहस्य को बताने योग्य हैं ,कारण की आप सर्वज्ञ हैं,सर्व शक्तिमान  एवम् परमानन्द स्वरूप हैं।

देव ! आप ही देश ,काल एवम् माया से परे हैं ,आपके अतिरिक्त कोई है ही नहीं।

ब्रह्मा जी के इस प्रकार कहने पर श्री हरि बहुत प्रसन्न हुए  एवम् उन्हें साधुवाद देते हुए कहा- ब्रह्मा जी ! सुनिए ,यह ज्ञान सारे बंधन को तोड़ देने वाला एवम् मुक्ति प्रदान करने वाला है।

अथर्ववेद की देवदर्शी शाखा के तहत नारायण उपनिषद में गुरु शिष्य का दिव्य वार्तालाप हुआ है,सो उसी को सुनाता हूं ,तुम ध्यान से सुनो।

एक समय शिष्य ने गुरु के निकट जाकर बड़ी विनय से उनका पूजन किया एवम् हाथ जोड़कर उनसे पूछा - भगवान!

आप मुझे परम तत्व का रहस्य बताइए।

तब गुरु ने शिष्य की प्रसंशा की एवम् दिव्य ज्ञान देना शुरू किया।

ब्रह्म कैसा है?

जो तीनों कालों से  बाधित नहीं है अर्थात किसी भी काल में जिसका अभाव नहीं होता,जो शाश्वत है,वही ब्रह्म है।ब्रह्म में आदि ,मध्य तथा अंत नहीं है

जो माया से परे, दिव्य गुण वाला अर्थात गुणों से परे वा कालातीत हो तथा जो देश ,काल व वस्तु की सीमा में नहीं आता ,वही परमेश्वर है।

यह ब्रह्म निश्चय ही परमानन्द स्वरूप,अखंड एवम् अनंत उपनिषदों द्वारा जानने के योग्य है। यह सब दृश्य -अदृश्य जगत ब्रह्म है। ब्रह्म सगुण एवं निर्गुण दोनों हैं। ब्रह्म अनंत प्रमाणों से अज्ञेय, अखंड एवं परिपूर्ण हैं। ब्रह्म सच्चिदानंद स्वरूप एवम् स्वत: प्रकाशित हैं,मन एवम् बानी की उस तक पहुंच नहीं है।

ब्रह्म तुरीय एवम् निराकार तथा सब प्रकार से परिपूर्ण है।

ब्रह्म प्रणव की आत्मारूप है।

ब्रह्म के चार पाद हैं ,यह इस प्रकार से हैं - १. अविद्या पाद ,२.विद्या पाद ,३.आंनद पाद ,४.तुरीय पाद

विद्या ,आंनद एवम् तुरीय पाद के अंश सभी पादों में विद्यमान रहते हैं।

ऊपर के तीनों पाद आंनद से परिपूर्ण,अखंड एवम् शाश्वत रहते हैं।

आंनद पाद के मध्य दिव्य तेजोमय वैकुंठ में श्री नारायण रहते हैं।वे ही तुरीय ब्रह्म हैं ,वे ही तुरिय से अतीत तथा समस्त ब्रह्म बाचक शब्दों के वाच्य हैं एवम् वे ही परम ज्योति हैं।

वे ही मायातीत,गुण से परे एवम् कालातीत हैं।वह श्री हरि सत्य एवम् उपाधि रहित हैं ,वह परमेश्वर समस्त कर्मों से परे हैं।न उनमें प्रारंभ है ,न मध्य एवम् न अंत ही।प्रणव आदि की आत्मा भी वही हैं।वे सत्य संकल्प है एवम् सब प्रकार से परिपूर्ण हैं।

तीनों कालों से बाधित नहीं है,एकमात्र अद्वितीय है, अनंत,अचिंत्य ऐश्वर्य वाले एवम् तूरीय  ,नित्य ,निष्कलंक ,निराकार,संज्ञा रहित,शुद्ध देवता एकमात्र नारायण हैं,जो इस प्रकार से जनता है,वह उन परमेश्वर धाम को जाता है।।


त्रिपाद विभूति नारायण भाग -02


लेवल - who is tripad vibhooti narayan ?

Where is vaikunth lok ?

Parmeshwar narayan kahan rahte h ?





टिप्पणियाँ

Unknown ने कहा…
आनंद पाद ही भक्ति का फल है