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ब्रह्मा ,विष्णु आदि की उम्र क्या है ?

 महा नारायण उपनिषद

कलियुग  = 4,32000 वर्ष ,

द्वापर युग = 8,64000 वर्ष,

त्रेतायुग = 12,96000 वर्ष,

सतयुग = 17,28000 वर्ष


ब्रह्मा जी  अपने जीवन के अंतिम क्षण में  महा विष्णु में  लीन होते हैं।

ब्रह्मा जी की कुल आयु १००वर्ष है।(१००० चतुर्युग का ब्रह्मा जी का एक दिन फिर इतने ही समय की रात्रि ।

सो दिन और रात मिलकर ब्रह्मा जी का १ दिन कहा जाता है।

ऐसे १५ दिन = १ पक्ष ,

२ पक्ष = १ महीना,

२महीना =१ ऋतु  ,

३ ऋतु = १ अयन,

२ अयन =१ वर्ष 

ऐसे  ब्रह्मा जी की कुल आयु १०० वर्ष बताई गई है।)

जिस समय ब्रह्मा जी महाविष्णु में लीन होते हैं,उस समय सबकुछ प्रकृति में लीन हो जाता है,कुछ भी नहीं रहता अर्थात सबका अभाव हो जाता है।फिर इतने समय तक उनकी प्रलय रहती है।

श्री ब्रह्मा जी की स्थिति एवम् उनका प्रलय महाविष्णु के दिन एवम् रात कहे जाते हैं।

इस प्रकार से दिन व रात मिलकर १दिन होता है । 

१५ दिन = १ पक्ष , २ पक्ष =१ महीना, २ महीना= १ ऋतु, 

३ ऋतु = १ अयन ,

२ अयन = १ वर्ष अर्थात १२ महीने।

इस प्रकार से १०० करोड़ वर्ष तक का महाविष्णु का संपूर्ण जीवन होता है।

वह अपने अंतिम समय में विराट पुरुष में लीन हो जाते हैं एवम् उनके ब्रह्मांड का नाश हो जाता है।फिर इतने लंबे समय तक अर्थात १०० करोड़ वर्ष तक प्रलय रहती है।


महा विष्णु की स्थिति व प्रलय विराट पुरुष के दिन व रात कहे जाते हैं।

यह दिन व रात से १दिन होता है।

१५ दिन = १ पक्ष ,२ पक्ष = १ महीना ,२ महीना = १ ऋतु, 

३ ऋतु = १अयन ,२अयन = १ वर्ष अर्थात १२ महीने।

इस प्रकार से विराट पुरुष का जीवन १ अरब अर्थात १०० करोड़ वर्ष का होता है।

स्थिति के अंत में विराट पुरुष माया उपाधिक नारायण में लीन हो जाते हैं 

अब १०० करोड़ वर्ष तक प्रलय रहता है,सब कुछ अभाव रूप रहता है।



विराट पुरुष की स्थिति व प्रलय माया उपाधिक नारायण के दिवस व रात्रि कहे जाते हैं।

सो दिन व रात्रि से १ दिन होता है , १५ दिन = १ पक्ष,२पक्ष = १ मंथ ,२ महीने = १ऋतु,३ ऋतु= १अयन ,

२ अयन = १वर्ष अर्थात १२ महीने।

ऐसे करके नारायण की संपूर्ण आयु १०० करोड़ वर्ष तक होती है।

स्थिति के अंत में त्रिपाद विभूति नारायण की लीला से उन परमेश्वर की पलकें गिरती हैं ,जिससे संपूर्ण अविद्या अंड नष्ट हो जाता है एवम् माया उपाधिक नारायण अपने  वास्तविक स्वरूप को प्राप्त हो जाते हैं।

फिर इतने लंबे समय तक अर्थात माया उपाधिक नारायण की आयु तक अर्थात १००करोड़ वर्ष तक महाप्रलय रहता है।

उस समय जो महामाया है,वह अव्यक्त में प्रवेश कर जाती है एवम् अव्यक्त ब्रह्म में प्रवेश कर जाता है।फिर एकमात्र त्रिपाद विभूति नारायण ही शेष रहते हैं,जो पूर्ण ब्रह्म हैं।

दिव्य वैकुंठ लोक में रहत हैं।

धन्यवाद

कबीर साहब का जो झूलना रेखता छंद हैं , उसमें जिन परमेश्वर तक पहुंचने का मार्ग दिया गया है,वह परमेश्वर और कोई नहीं स्वयं श्री हरि भगवान हैं, जहां वह अपने मूल रूप से विराजमान होते हैं,इन्हीं के पूर्ण स्वरूप गोलोक अधिपति श्रीमान गोविंद  हैं (जो कृष्ण नाम से विख्यात हैं )

इन्हीं श्री हरि के एक  स्वरूप विराट पुरुष है,जो प्रत्येक ब्रह्मांड में नारायण रूप से विराजमान होते हैं,फिर इन नारायण के नाभि कमल से ब्रह्मा जी उत्पन्न होते हैं।

और वह सृष्टि करते हैं।


महा नारायण उपनिषद के अनुसार आंनद पाद के मध्य स्थित अयोध्या नगर में जो महा पुरुष  विराजित हैं,उनके एक नख का प्रकाश अनंत कोटि सूर्य व चन्द्र के तुल्य है।



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