- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप
Featured post
- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप
दयानंद सरस्वती का जन्म गुजरात(टंकारा) के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था उनके बचपन का नाम मूल शंकर था।
दयानन्द सरस्वती जी का जीवन काल(1824-83)-
सत्य की तलाश में लगभग 15 वर्षों तक इधर-उधर भटकते रहे।
मथुरा के अंधे गुरु स्वामी विरजा नंद से उन्होंने वेदांत की शिक्षा ग्रहण की।
उन्होंने 1875 में बॉम्बे में आर्य समाज की स्थापना की।बाद में इसका मुख्यालय बंबई से लाहौर स्थानांतरित कर दिया।
आर्य समाज के प्रमुख दस सिद्धांत -
वेद ही ज्ञान के स्रोत हैं अत: वेदों का अध्ययन आवश्यक है।
2. वेदों के आधार पर मंत्र पाठ करना।
3. मूर्ति पूजा का खंडन।
4. तीर्थ यात्रा और अवतारवाद का विरोध।
5.कर्म ,पुनर्जन्म एवम् आत्मा के बारंबार जन्म लेने पर विश्वास।
6.एक ईश्वर में विश्वास,जो निरंकारी है।
7.नारी शिक्षा को प्रोत्साहन।
8. वाल विवाह और वहुविवाह का विरोध।
9.कुछ विशेष परिस्थिति में विधवा पुनर्विवाह का समर्थन।
10.हिंदी एवम् संस्कृत भाषा के प्रसार को प्रोत्साहन।
आर्य समाज ने विवाह हेतु लड़कों की न्यूनतम आयु 25 वर्ष तथा लड़कियों की न्यूनतम आयु 16 वर्ष निर्धारित की। देश में भूकम्प ,सूखा , बाढ़ आदि आने पर यह संस्था मदद करती थी।
शिक्षा क्षेत्र में दयानंद एंग्लो वैदिक स्कूलों की स्थापना की गई
इस प्रकार का पहला स्कूल लाहौर में 1886 में खोला गया।।
हिन्दू धर्म रक्षा हेतु शुद्धि आन्दोलन चलाया ताकी जो लोग किसी दबाव वश दूसरे धर्म में चले गए,वापस सनातन धर्म में आ सकें।उन्होंने राम ऑर कृष्ण को ईश्वर अवतार न मानकर महा पुरुष के रूप में स्वीकार किया ।
उनका मानना था कि वेद ही हिन्दू धर्म की सर्वोच्च पुस्तक हैं ।
जबकि पुराणों कि आलोचना की ।
आर्य समाज के अनुसार ईश्वर निराकार है अत: मूर्ति पूजा नहीं की जानी चाहिए।
इसलिए स्वामी दयानन्द सरस्वती जी ने वेदों की ओर लौटो का नारा दिया ,जिसका उद्देश्य धर्म की बुराइयों को दूर करना था।।
हिन्दू रूढ़िवादिता,जातिगत कठोरता की आलोचना की ,उनका मानना था कि जाति का निर्धारण जन्म आधारित न होकर कर्म आधारित होना चाहिए।।
दयानंद सरस्वती की प्रसिद्ध रचना सत्यार्थ प्रकाश है,जिसमें उनके विचार और चिंतन को हम देख सकते हैं।
इस बुक मेंजन मानस की धार्मिक जिज्ञासाओं को दूर किया गया एवम् हिन्दू धर्म में जो खामियां थीं,उन पर प्रकाश डाला गया है। इसके साथ -2 अन्य धर्मों के पाखंड की निंदा है।
दयानंद सरस्वती ने अपने ज्ञान एवम् विवेक से से इस्लामी एवम् ईसाई मिशनरियों से भारतीय हिन्दू धर्म की रक्षा की।
हम कह सकते हैं कि दयानन्द यह चाहते थे कि एक ऐसी समाज कि स्थापना हो जिसमें जाति गत भेदभाव ,विदेशी दासता से मुक्ति एवम् संपूर्ण देश में आर्य समाज की स्थापना हो।।
टिप्पणियाँ