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नकली संतों का पर्दाफाश,अर्जुन को दिया गया गीता ज्ञान काल ब्रह्म का नहीं था।
(महाभारत ,शांति पर्व )
एक बार देवर्षि नारद जी क्षीर सागर के उतर तट पर स्थित श्वेत दीप में जा पहुंचे ,वहां के लोगों ने देवर्षि का स्वागत सत्कार किया, इसके बाद देवर्षि प्रभु दर्शन की लालसा से वहीं रहकर श्री हरि नाम जाप तथा यम नियम आदि का कठोरता से पालन करते रहे।
एक समय स्तुति करने पर भगवान ने विश्व रूप धारण कर उन्हें दर्शन दिया।
उनके श्री विग्रह का कुछ भाग चंद्रमा से भी निर्मल तथा कुछ भाग चंद्रमा से विलक्षण था ,कुछ भाग अग्नि के समान था।
वह अपने विग्रह में नाना प्रकार के रंग धारण किए थे। उनके हजारों नेत्र, हजारों मस्तिष्क, हजारों उदर तथा हजारों पैर आदि थे ।बे एक मुख से गायत्री सहित ओमकार का जाप तथा अन्य मुखों से वेदों और अरण्यकों का गायन कर रहे थे।
भगवान परम प्रसन्न दिखाई दे रहे थे।नारद जी प्रभु के चरणों में पड़ गए तब देवताओं के आदि कारण अविनाशी भगवान ने नारद जी से कहा - वास्तव में मेरे अनन्य भक्त के सिवा कोई भी मुझे नहीं देख सकता, तुम मेरे अनन्य भक्त हो,इसी से मेरे दर्शन पा सके।
मुनिवर धर्म के घर जिन्होंने अवतार लिया है ,वह नर नारायण मेरे ही स्वरूप है,तुम उनका भजन किया करो। मैं तुमसे प्रसन्न हूं ,कोई वर मांग लो।तब नारद जी ने कहा - आपके दर्शन हो गए तो मुझे यम ,नियम ,जाप आदि सबका फल मिल गया।आपका दर्शन ही मेरे लिए वरदान है।
भगवान ने कहा- जो तुम मुझे अपने नेत्रों से देख रहे हो,यह मेरी रची माया का ही प्रभाव है, वरना कोई भी मुझे अपने नेत्रों से नहीं देख सकता।
मैं सर्वत्र व्यापक तथा समस्त जीवों का अन्तर आत्मा हूं ।
प्राणियों का नाश हो जाने पर भी मेरा नाश नहीं होता।
ऋषिवर देखो! मेरे दाहिने भाग में ११ रूद्र ,वाम भाग में १२ आदित्य विराजमान हैं और अग्र भाग में ८ वसु ,पृष्ठ भाग में दोनों अश्विनी कुमार स्थित हैं।
यह देखो संपूर्ण प्रजापति, सात ऋषि ,वेद ,यज्ञ ,अमृत ,ओषधि तथा नाना यम नियम भी मूर्तिमान हैं।
इसके बाद उस विराट पुरुष ने नारद जी को संपूर्ण जगत के दर्शन अपने विग्रह में ही कराए।
श्री हरि आगे बताते हैं कि ऋषिवर वेद मे जिनकी स्तुति की गई है,वह हिरण्यगर्भ मै ही हूं तथा योगिलोग जिस ब्रह्म में रमण करते हैं ,वह भी मै ही हूं।
इस समय व्यक्त रूप धारण कर आकाश में स्थित हूं फिर हजार युग व्यतीत होने पर इस जगत का संहार करूंगा और फिर संपूर्ण चर अचर प्राणियों को अपने में लीन कर विद्या शक्ति के साथ विहार करूंगा, सष्टी काल आने पर विद्या शक्ति के द्वारा मैं ही संसार की रचना करूंगा।
इसके बाद श्री भगवान देवर्षि नारदजी को बताते हैं कि त्रेता युग में
वही राम रूप से रावण आदि का नाश करेंगे
और द्वापर युग के अंतिम चरण में वह कृष्ण रूप से कंस, बानासुर ,एवम् महाभारत युद्ध में पांडवों के द्वारा सभी दुष्टों का नाश करवाएंगे।
उस समय धरती पर लोग यही कहेंगे कि नर नारायण ही अर्जुन और कृष्ण रूप में क्षत्रियों का संहार कर रहे हैं।
वाद में यादवों का भी नाश करबा कर धरती के बोझ को कम कर दूंगा।
नारद जी ! आप मेरे अनन्य भक्त हो ,इसी से मैंने यह भूत और भविष्य का रहस्य बता दिया ,इतना कहकर विश्वरूप श्री नारायण अंतर्ध्यान हो गए।
तब देवर्षि नारदजी भी नर नारायण के दर्शन हेतु उनके पास गए।
अब आप श्री मद्भागवत गीता में ११ वें अध्याय पर आइए ,
श्रीभगवानुवाच-
पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रश: ।
नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च ॥5॥
श्रीभगवान् बोले -
हे पार्थ ! अब तू मेरे सैकड़ों–हज़ारों नाना प्रकार के और नाना वर्ण तथा नाना आकृति वाले अलौकिक रूपों को देख।
पश्यादित्यान्वसून्रुद्रानश्विनौ मरूतस्तथा । बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत ॥6॥
हे भरतवंशी अर्जुन! मुझमें आदित्यों को अर्थात् अदिति के द्वादश पुत्रों को, आठ वसुओं को, एकादश रुद्रों को, दोनों अश्विनी कुमारो को और उनचास मरूद्गणों को देख तथा और भी बहुत-से पहले न देखे हुए आश्चर्यमय रूपों को देख।
इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् । मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसि ॥7॥
हे अर्जुन! अब इस मेरे शरीर में एक जगह स्थित चराचर सहित सम्पूर्ण जगत् को देख तथा और भी जो कुछ देखना चाहता हो सो देख ॥7॥
अर्जुन भगवान को देख नहीं पा रहे थे तब श्री कृष्ण अर्जुन को अपने विराट रूप को देखने हेतु दिव्य नेत्र देते हैं।
अर्जुन श्री कृष्ण के विग्रह में संपूर्ण ब्रह्मांड को देखता है ,वह ब्रह्मा ,शिव व दिव्य सर्पों को भी देखता है।
वह श्री कृष्ण को अनेकों सिर ,नेत्र व हाथ पैर युक्त देखता है। अर्जुन को इस रूप का न तो अंत दिखाई देता है और न ही प्रारंभ।
श्री कृष्ण अर्जुन को बताते हैं लोकों का नाश करने वाला बढ़ा हुआ काल हूँ। इस समय इन लोकों को नष्ट करने के प्रवृत्त हुआ हूँ। इसलिये जो प्रतिपक्षियों की सेना में स्थित योद्धा लोग हैं वे सब तेरे बिना भी नहीं रहेंगे अर्थात् तेरे युद्ध न करने पर भी इन सबका नाश हो जायेगा।
अब प्रश्न यह उठता है कि संतों ने इस रूप को काल ब्रह्म कह दिया और सदाशिव का रूप बताया।
जबकि विराट रूप श्री कृष्ण ने स्वयं को सदाशिव अथवा काल ब्रह्म नहीं कहा।
हमने ऊपर देखा कि श्री नारायण ने देवर्षि नारद जी को अपने लोक श्वेत द्वीप में इसी विराट पुरुष के दर्शन कराए।
महाभारत युद्ध के बाद जब श्री कृष्ण द्वारिका आ रहे थे तो
मरू भूमि में उतंक ऋषि उन श्री कृष्ण को महाभारत युद्ध का दोषी मानते हुए उन्हें श्राप देने लगे तब श्री कृष्ण ने उतंक ऋषि को समझाते हुए अपने इसी विराट रूप के दर्शन कराए।श्री कृष्ण ने स्वयं कहा की मुझे किसी का श्राप नहीं लगता।
भागवत में भी श्री भगवान ने संसार रचना से पहले नारायण के रूप में अवतार लिया ,और उनके नाभि कमल से ब्रह्मा जी प्रकट हुए।
यह नारायण ही विराट पुरुष रूप धारण करते हैं।
इनके उस रूप का वर्णन भागवत में दिया है।
सो रामपाल जी ने सत्य को जाने बिना कह दिया कि श्री कृष्ण के विग्रह में काल ब्रह्म ने प्रेत कि तरह प्रवेश कर अर्जुन को दिव्य ज्ञान दिया।
रामपाल जी की तरह ही ब्रह्म कुमारी संस्था श्री कृष्ण को गीता ज्ञान दाता नही मानती।
यह सब लोग स्वयं को परम सत्य मानते हैं और सनातन संस्कृति का अपमान करते हैं।
जबकि शास्त्रों में दिया है कि कुरुक्षेत्र भूमि पर अर्जुन को श्री कृष्ण ने दिव्य गीता ज्ञान दिया।
श्री कृष्ण ने सूर्य देव विवस्वान को भी बहुत समय पहले गीता ज्ञान दिया था।
मैं समझता हूं कि आम जनता जो कृष्ण तत्व से अपरिचित है ,वह लोग इनके ज्ञान में फंस जाते हैं।
महेश्वर तंत्र में स्वयं
भगवान सदा शिव ने ईश्वर को ,ईश्वर ने समाधि अवस्था में शंकर भगवान को दिव्य ज्ञान दिया।
शंकर भगवान ने माता पार्वती को दिव्य ज्ञान दिया।
वह ज्ञान इस प्रकार है-
अक्षर ब्रह्म अगणित ब्रह्मांड की रचना करते हैं और नाश कर दिया करते हैं।
अक्षर ब्रह्म की ही विराट पुरुष ,हिरण्य गर्भ ,तथा श्री नारायण संज्ञा है।
अक्षर ब्रह्म से ऊपर वृंदावन में श्री कृष्ण आंनद विहार करते हैं।
अक्षर ब्रह्म से परे अक्षर अतीत श्री कृष्ण चन्द्र जी मन ऑर वाणी से परे दिव्य ब्रह्मपुर में विराजते हैं।
ब्रह्मपुर की स्थिति कोटि योजन विस्तार वाले अमृत समुद्र के मध्य रत्न द्वीप में है।
यमुना नदी के एक किनारे पर निज धाम है
ऑर दूसरे तरफ अक्षर ब्रह्म का धाम है।
अक्षर ब्रह्म की श्री कृष्ण लीला दर्शन लालसा तथा परम धाम में श्री कृष्ण सखियों का अक्षर ब्रह्म की लीला देखने की इच्छा से ही स्वयं अक्षर ब्रह्म से परे श्री कृष्ण को इस ब्रह्मांड में आना पड़ा।
श्री कृष्ण अक्षर ब्रह्म से परे हैं,इस बात की पुष्टि ब्रह्म वैवर्त पुराण,गर्ग संहिता एवम् ब्रह्म संहिता से हो जाती है।
जैसे ब्रह्म संहिता का यह श्लोक
ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्द विग्रहः।
अनादिरादि गोविन्दः सर्वकारण कारणम्॥
(श्री कृष्ण परम ईश्वर हैं तथा सच्चिदानन्द हैं। वे आदि पुरुष गोविन्द समस्त कारणों के कारण हैं।
ब्रह्म संहिता में अक्षर ब्रह्म कारण वारी में शयन करने वाले महाविष्णु को कहा गया। इनके अधीन अनंत ब्रह्मांड हैं ,यह उन्हें बनाते और नाश करते रहते हैं।
ब्रह्म वैवर्त पुराण में वर्णित है कि महाविष्णु जो कारण वारी में शयन करते हैं वहीं प्रत्येक ब्रह्मांड में विष्णु रूप धारण कर अपने नाभि कमल से ब्रह्मा जी को प्रकट करते हैं।
फिर ब्रह्मा जी संसार रचना करते हैं।
लेख को और अधिक विस्तार न देते हुए थोड़े शब्दों में बताता हूं
की नकली संतों ने हमें भ्रमित किया है ।
जो श्री कृष्ण परम सत्य हैं,उनसे दूर करने का प्रयास किया।
ब्रह्म कुमारी संस्था श्री कृष्ण को नारायण का अवतार कहकर एक जगत तक सीमित करती है।
जबकि हमारे शास्त्र उन्हें अनंत कोटि ब्रह्माण्ड नायक बताते हैं।भागवत में उद्धव से स्वयं कहा है कि जब उनके बनाए हुए ब्रह्मांडो की गिनती संभव नहीं ,तो कोई उन्हें तो पार पा ही नहीं सकता।
रामपाल जी ने गलत ज्ञान का प्रचार कर जनता को भ्रमित किया। ऑर स्वयं को परम अक्षर ब्रह्म का अवतार घोषित कर रखा है (ज्ञान गंगा),जो सरासर ग़लत है।
लोगों को मूर्ख बनाने की भी कोई हद होती है।
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धन्यवाद ।
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