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जब अर्जुन ने श्री कृष्ण के रास उत्सव में भाग लिया।

 प्रमाण -पाताल खण्ड ( पद्म पुराण )

एक समय यमुना नदी के तट पर श्रीकृष्ण के पास अर्जुन बैठे हुए थे उन्होंने कथा प्रसंग में ही भगवान से प्रश्न किया

हे दयासागर प्रभु श्री शिव तथा ब्रह्मा जी आदि ने भी आपके जिस रहस्य का दर्शन अथवा श्रवण न किया हो उसी का मुझसे वर्णन कीजिए।पूर्व में आपने कहा था कि गोप कन्याएं मेरी प्रेयसी हैं

वे कितने प्रकार की और संख्या में कितनी है उनके नाम क्या क्या हैं उनमें से कौन कहां रहती हैं हे देव उनके कौन कौन से कर्म हैं तथा उनकी अवस्था और वेश कैसा है,हे ईश्वर उनमें से आप किन किन के साथ एकांत विहार करते हैं।वह परम महान नित्य और शाश्वत स्थान कहां है?

यदि आपकी मुझ पर पूर्ण कृपा हो तो मेरे सभी प्रश्नों का उत्तर दीजिए।हे पीड़ितों की पीड़ा हरने वाले !जो आपके अन्य रहस्य हैं,उनका भी वर्णन कीजिए।तब भगवान बोले- वह मेरा स्थान और वह मेरी वल्लभाऐं  और उनके साथ मेरा विहार- यह मेरे प्राण प्रिय

पुरुषों के भी जानने की बात नहीं है इसे तुम सच मानो  उसकी चर्चा कर देने पर तुम्हें उसे देखने की इच्छा प्रकट हो जाएगी।

जो रहस्य ब्रह्मा आदि के लिए भी दृश्टव्य नहीं है वह अन्य जनों के लिए कैसा है,यह कहने की बात नहीं। अतः हे भाई उसके बिना तुम्हारा क्या बिगाड़ता है उसे सुनने का आग्रह छोड़ दो।

तब अर्जुन हरि के चरणों पर गिर पड़े अतः भगवान ने 

जिस देवी से समस्त ब्रह्माण्ड का आविर्भाव हुआ है ,वह अब भी जिसमें स्थित है और अंत में जिसमें लीन होगा उसी श्री मति भगवती त्रिपुर सुंदरी की अत्यंत भक्तिपूर्वक आराधना करके उनको आत्म समर्पण कर दो कारण कि उन देवी की कृपा बिना उस स्थान को दिखा देने की सामर्थ्य मुझमें भी नहीं है।यह सुनकर अर्जुन के नेत्र आनंद से भर आए।

तब हरि आदेश से वह भगवती के स्थान पर गये , वहां जाकर देवी के दर्शन पाकर पार्थ का मन आनंद से भर गया तब अर्जुन ने देवी की आराधना की। तब देवी प्रकट हो अर्जुन से बोलीं --- हे वत्स! इस संसार में कौन सा दुर्लभ शुभ कर्म तुमसे हुआ है जिससे शरणागत वत्सल भगवान ने तुम्हें इस अत्यंत गूढ़ रहस्य को जानने का अधिकारी समझा है।हे पुत्र! विश्व रुप भगवान ने तुम पर जैसा अनुग्रह किया है वैसा भूतलवासी अन्य मनुष्यों पर और‌ स्वर्ग वासी देवताओं पर, तपस्वी,योगी तथा अन्य भक्तों पर भी कभी नहीं किया। अतः तुम मेरी इस सखी के साथ उस कुण्ड  में जाओ और उसमें स्नान करके शीघ्र मेरे पास लौट आओ।तब अर्जुन उस सरोवर में स्नान कर देवी के पास लौट आए

तब अर्जुन ने देवी की आज्ञा से उनकी  आराधना  की इससे अर्जुन धन्य हो गये।तब देवी प्रकट हो गयीं और अर्जुन से बोलीं- बेटा!इस समय तुम उस घर के अंदर जाओ

तब अर्जुन देवी आदेश से उनकी सहचरी के साथ राधापति के स्थान पर गये। जहां सिद्ध भी नहीं पहुंच सकते। इसके बाद देवी की सखी के उपदेश से उन्होंने गोलोक से भी ऊपर स्थित नित्य वृंदावन धाम का दर्शन किया।जो पूर्ण प्रेम, रसात्मक  तथा परम गुह्या है सखी के वचन से ही दिव्य नेत्रों से रहस्यमय स्थान को देखकर अर्जुन बड़े हुए प्रेम और भक्ति से आनंद विह्यल हो वहीं मूर्छित होकर गिर पड़े।

फिर कठिनता से होश में आने पर सखी से उन्होंने पूछा कि अब मुझे कौन सा जप तप करना चाहिए।तब सखी अर्जुन को वहां से दक्षिण की ओर एक सरोवर पर ले गयीं और कहा - हे पार्थ! तुम इस जलराशि में स्नान करो।इस सहस्त्रदल कमल का आकार है इसके चारों ओर चार घाट है यह सरोवर जल जंतुओं से व्याप्त है इसके भीतर प्रवेश कर विशेष बातों को जान सकोगे। इसमें स्नान कर पूर्व सरोवर पर जाओ और अपना मनोरथ पूर्ण करो।

तब अर्जुन ने जैसे ही स्नान किया तो वह सुंदर नारी हो गई और पूर्व शरीर का सारा ज्ञान भूल गयी ,वह भ्रम में पड़ी बहीं खड़ी रही।

इसी समय आकाश वाणी हुईं 

हे सुंदरी! तुम इसी मार्ग से पूर्व सरोवर पर जल का आचमन कर अपना मनोरथ पूर्ण करो।

तब अर्जुन पूर्व सरोवर पर गये अब जैसे ही उन्होंने जल का आचमन किया तब अनेकों सुंदरियां वहां आईं। अर्जुन ने उनसे पूछा हे सुंदरियों तुम कौन हो किसकी पुत्री अथवा कौन तुम्हारे प्राण वल्लभ हैं।तब उनमें से एक सखी ने कहा-हम सभी भगवान वृंदावन गोकुलेश्वर श्री गोविन्द की प्राणप्यारी हैं तथा विहार सहचरी हैं यहां जो भी वृक्ष अथवा लताऐं हैं वह सभी सिद्ध महर्षि गण हैं।हे देवी !हम लोगों के साथ तुम भी हरि भगवान के साथ विहार करोगी।हे देवी ! पूर्व सरोवर पर चलो और वहां स्नान कर तुम भगवान गोविन्द की प्रिया राधा रानी की उत्तम सिद्धिदायक मंत्रों से आराधना करो। तब उसने उस सरोवर में स्नान कर भगवती कृष्ण प्रिया की आराधना की।

तब उसकी आराधना से खुश होकर राधा रानी प्रकट हुई और फिर उसे अपनी सखी बनाकर उत्तर सरोवर पर ले गयीं , वहां उसे स्नान कराकर गोकुलेश्वर श्री कृष्ण का मंत्र दिया ध्यान करना सिखाया और फिर वह श्रीकृष्ण के निकट चली गईं।

अर्जुनी ने बड़ी भक्ति भाव से कृष्ण पूजा की तब श्रीकृष्ण ने उस अर्जुनी को अपने निकट बुलवाया।

रसिक शेखर श्रीकृष्ण के दिव्य रुप को देखकर वह अर्जुनी मूर्छित हो गई और जब होश में आईं

तब उसने उस  धाम को देखा वहां सबकुछ अद्भुत था वहां दिव्य कल्पवृक्ष दिखाई दिया उसके नीचे रत्न मंदिर था उसमें दिव्य सिंहासन पर अष्टदल कमल था जिसके वाएं दाएं क्रमश शंख और पद्म निधि रखे थे उस कमल पर श्रीकृष्ण राधा रानी के साथ विराजमान थे हरि भगवान को देखकर वह पुलकित हो गई और उसके ह्रदय में दिव्य आनंद उत्पन्न हुआ।

श्री कृष्ण ने रास में उसे सुख प्रदान किया और फिर अपनी सखी से कहा- तुम अर्जुनी को उस सरोवर में स्नान कराओ।

तब अर्जुनी ने जैसे ही जलराशि में डुबकी लगाई, वहां का सब दृश्य अदृश्य हो गया और वह यमुना नदी के तट पर बैठे हैं

तब अर्जुन शांत बैठे हुए थे तभी श्रीकृष्ण प्रकट हुऐ और वोले

- हे सखे!

इस रहस्य को प्रकाशित न करना ।

यह बड़ा आत्मानंद रस है।

धन्यवाद।


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