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सृष्टि रचना कैसे हुई?,सृष्टि का निर्माण कैसे हुआ?,ब्रह्माण्डों का निर्माण करता कौन है?

  सृष्टि से पूर्व निर्गुण और निराकार एक परब्रह्म परमात्मा  ही थे उनके अलावा कुछ नहीं था ,सभी तत्वों का नाश हो गया था 

अर्थात न पृथ्वी,न जल ,न अग्नी ,न वायु और आकाश आदि कुछ भी न था।। वह परब्रह्म(कृष्ण नाम से प्रसिद्ध) योगमाया को स्वीकार करके दो रुप वाले हो गये।उनका दाहिना पुरुष रुष कृष्ण हुआ और वायां अंग स्त्री रुप राधा हुआ ।।

तब तो श्रीकृष्ण मूल प्रकृति रुप राधा के साथ रासमण्डल में पधारे 

रासमण्डल की भूमि रत्नमयी थी हजारों दिव्य खम्बे प्रकाश कर रहे थे।रास प्रारम्भ हुआ और ब्रह्मा आयु पर्यन्त होता रहा।

रास अंत 

में श्रीकृष्ण ने निज स्वरुपा राधा रानी के क्षेत्र में अपने तेज का आधान किया,श्रम के कारण स्वेद श्री विग्रह से बहने लगा तब उस स्वेद से ब्रह्माण्ड गोलक  बन गया और राधा रानी के श्वास रुप वायु से पवन देवता प्रकट हुऐ और पवन से उनकी शक्ति।

जल के अधिष्ठाता वरुण देव प्रकट हुए और उनसे उनकी शक्ति।

श्रीकृष्ण की इच्छा से वह राधा देवी गर्भवती हो गयी,वह उस तेज को पूरे १०० मनवन्तर तक धारण किये रही।

तब १०० मनवन्तर के बाद राधा रानी ने बालक को जन्म दिया।

उसे देखकर वह दुखी हुईं और उस बालक को ब्रह्माण्ड गोलक में छोड़ दिया।

यह देखकर श्रीकृष्ण क्रोधित हो गये 

तब देवी से कहा - अरे यह वडा़ घृणित कर्म तुमने कर दिया ,अब तुम कभी संतान उत्पन्न नहीं कर सकोगी और तुमसे जो भी देवियां प्रकट होगीं,वह भी संतानहीन ही होंगी।

इतने में ही देवी के जिव्हा से सरस्वती देवी से प्रकट हो गयीं  तथा कृष्ण प्रार्थना कर सिंहासन पर विराजमान हुईं।

और कुछ समय बाद राधा भी दो रुपों में विभक्त हो गयीं।

दाहिने अंग में राधा ही रही और वायां अंग लक्ष्मी हुआ।

अब श्रीकृष्ण भी दो रुपों में विभक्त हो गये अर्थात कृष्ण और विष्णु।

तब श्रीकृष्ण ने लक्ष्मी और सरस्वती को विष्णु को दी और वह उन दोनों को साथ ले वैकुण्ठ धाम पधारे।

श्रीकृष्ण से वुद्धी अधिष्ठात्री देवी दुर्गा प्रकट हुईं यह त्रिगुणमयी थीं और सहस्त्र भुजाओं वाली थीं कृष्ण आज्ञा से दिव्य सिंहासन पर बैंठी।अब श्रीकृष्ण दो रूपों वाले हो गये।

अर्थात महादेव और कृष्ण,दाहिना अंश कृष्ण था और वायां अंश महादेव ।पांच मुख वाले शिव गौर वर्ण तथा दिव्य थे ,वह कृष्ण के अर्धांग से प्रकट हुऐ थे

तब महादेव भी कृष्ण आज्ञा से दिव्य सिंहासन पर बैठे।

इतने में‌ ही कृष्ण नाभिकमल से ब्रह्मा जी शक्ती सहित प्रकट हुऐ और श्रीकृष्ण इच्छा से दिव्य आसनों पर बैठे।

यह सब सृष्टि रचना से पहले का प्रसंग है और परात्पर धाम में घटित हुआ।

अब वह बालक जो विश्व गोलक में छोड़ दिया गया था


। भूख प्यास से व्याकुल हो रोने लगा,जब उसे ज्ञान हुआ तब श्रीकृष्ण का ध्यान किया तब श्री हरि प्रकट हुऐ। तब पिता परमेश्वर को देख कर वह वालक हंस पडा़।श्रीहरि ने कहा- वत्स!तुम भूख,प्यास से रहित हो जाओ और असंख्य ब्रह्माण्डों के आश्रय बने‌ रहो ।

रोग ,शोक ,मृत्यु से रहित हो जाओ।

अब श्रीकृष्ण ने उसे षडक्षर मंत्र(कृष्ण मंत्र) का उपदेश किया।

और तब उस महाविष्णु ने कृष्ण से कहा - भगवन! अपके चरणकमलों में मुझे भक्ति प्राप्त हो ,मेरा मन आप में लगा रहा।

तब श्री हरि ने उससे कहा- पुत्र ! तुम असंख्य ब्रह्माओं के नाश को प्राप्त होने पर भी नाश को प्राप्त नहीं होगे।

प्रत्येक ब्रह्माण्ड में क्षुद्र विराट रुप‌ से प्रकट होगे,तुम्हारे नाभिकमल से ब्रह्मा और वाएं भाग से श्री विष्णु प्रकट होंगे वह श्वेत द्वीप में रहेंगे।ब्रह्मा से ही मानस पुत्र सनक ,सनतकुमार आदि,पुलह,पुलस्त्य आदि तथा बाद में मस्तिष्क से रुद्र शिव अंश से प्रकट होंगे।ब्रह्मा सृष्टि रचना करेंगे।तुम मेरे समान हो जाओ।

उस बालक के रोमकूपों में अगणित जगत स्थित माने जाते हैं

उसे श्रीकृष्ण ने लम्बी आयु का वर दिया और फिर दिव्य धाम को श्री हरि गये।शंकर जी से कहा कि आप ब्रह्मा के ललाट से अंश रुप से प्रकट हो जाना तथा स्वयं तप करें।।

वहां महादेव और ब्रह्मा जी को महाविराट के रोमकूप में स्थित ब्रह्माण्ड में जाने को कहा।


तब क्षुद्र विराट के नाभिकमल से ब्रह्मा प्रकट हुए ,वह अपने जन्म पिता को खोजने हेतु उस जल‌ में बडा़ प्रयास किया ,लाखों साल गुजर गये ,पर सफल न हुऐ।

अंत में कमल पर बैठकर श्रीचरणों का ध्यान किया तब क्षुद्र विराट फिर महाविराट और फिर गोलोक धाम में‌ श्री को देखा और फिर उन्होंने कृष्ण कृपा से सृष्टि रचना की।सातों पाताल,सातों स्वर्ग और भूमि रची।

प्रत्येक ब्रह्माण्ड में महाविराट, क्षुद्र विराट के रुप में प्रकट होते हैं वह ब्रह्माण्ड गोलक में जलराशि पर शयन करते हैं ,उनके नाभि कमल से प्रकट हो ब्रह्मा संसार रचना करते हैं और ब्रह्मा से सनक,सनन्दन आदि उत्पन्न हुऐ।क्षुद्र विराट को ही जनार्दन प्रभु कहा जाता है।

प्रमाण- देवी भागवत,भागवत पुराण,महेश्वर तंत्र।अन्य - गर्ग संहिता,ब्रह्म संहिता,शुक संहिता आदि।।।

दुर्गा देवी बाद‌ में शंकर की प्यारी पत्नी सती हुईं और फिर उससे भी बाद में पार्वती हुईं।।



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